Hindi Gospel Movie | बाइबल के बारे में रहस्य का खुलासा | Do You Know the Inside Story of the Bible?

फेंग ज्याह्वई, चीन की एक गृह कलीसिया की प्रचारक हैं। उन्‍होंने कई सालों से प्रभु में विश्‍वास किया है और सदा यह सोचा कि बाइबल परमेश्‍वर से प्रेरित है, कि अपनी आस्‍था में इसका अनुसरण करना आवश्‍यक है, परमेश्‍वर के वचन बाइबल के बाहर नहीं प्रकट होते, और बाइबल से भटकना विधर्म है। परंतु हाल के वर्षों में कलीसिया के उजाड़ हो जाने और विश्‍वासियों के अपनी आस्‍था के प्रति उदासीन हो जाने से, उनमें गहन संशय पैदा हुआ। वे बाइबल के बारे में चाहे जैसे भी बातें करतीं, तो भी वे अपनी कलीसिया को पुनर्जिवित करने में असफल रहीं .. जब तक कि एक सहकर्मी, भाई युआन ने, सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर की कलीसिया के गवाहों को आमंत्रित नहीं किया। गहन चर्चाओं के कई दौरों के पश्‍चात् फेंग ज्याह्वई अंतत: बाइबल की अंदरूनी कहानी और उसका सार समझ जाती हैं। वे उसके बाहर कदम रखती हैं, मेम्‍ने के पदचिन्‍हों पर चलती हैं, और अन्‍य विश्‍वासियों को सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर की ओर मुड़ने में उनकी रहनुमाई करती हैं।

स्रोत: यीशु मसीह का अनुसरण करते हुए

बाइबल की भविष्यवाणी खण्ड, प्रभु की वापसी की भविष्यवाणियों—छुपी हुई भविष्यवाणियों, अंत के दिनों के न्याय की भविष्यवाणियों के साथ और भी बहुत कुछ उपलब्ध कराता है, और उन भविष्यवाणियों के पीछे के वास्तविक अर्थ की व्याख्या करता हैI

बाइबल के प्रश्नों के उत्तर और पाएं आध्यात्मिक विकास

Hindi Christian Movie | इंतज़ार था जिन ख़ुशियों का | A True Christian Story (Hindi Dubbed)

डिंग रुइलिन और उसका पति एक कारोबार शुरू करने और उसे चलाने के लिये दिन-रात मेहनत करते हैं ताकि पैसा कमाकर, एक अच्छी ज़िंदगी जी सकें। लेकिन सीसीपी सरकार के शोषण और बुरे बर्ताव के चलते, वे कर्ज़ में बुरी तरह डूब जाते हैं। विदेश जाकर काम करने के अलावा, उनके पास और कोई विकल्प नहीं बचता। अधिक पैसा कमाने की गरज़ से, डिंग रुइलिन दो-दो काम पकड़ लेती है। काम के भारी बोझ और आस-पास के लोगों की बेरुख़ी से, उसे पीड़ा और पैसा कमाने की बेबसी का एहसास होता है। अपनी पीड़ा और उलझन के मध्य, डिंग रुइलिन की मुलाकात अपनी हाई स्कूल की एक सहपाठी लिन झिशिन से हो जाती है। बातचीत के दौरान डिंग रुइलिन को पता चलता है कि परमेश्वर में आस्था रखने की वजह से लिन झिशिन में बहुत-सी बातों की समझ आ गई है। परमेश्वर की उपस्थिति में, उसे आध्यात्मिक शांति और आनंद प्राप्त हो रहा है। वह सुकून और सहजता का जीवन जी रही है। इससे डिंग रुइलिन के मन में भी परमेश्वर में विश्वास रखने की भावना प्रबल होती है। जल्दी-जल्दी और अधिक पैसा कमाने के विचार से, डिंग रुइलिन और उसका पति एक रेस्टॉरेंट का अधिग्रहण कर लेते हैं। लेकिन लगातार काम और थकान की वजह से, डिंग रुइलिन एक गंभीर बीमारी का शिकार हो जाती है। उसे लकवा होने का ख़तरा बढ़ जाता है। बीमारी की यंत्रणा के दौरान डिंग रुइलिन को आत्म-चिंतन का अवसर मिलता है। लोग किसलिये जीते हैं? क्या महज़ धन-दौलत और शोहरत के लिये जीवन गँवा देना सही है? क्या धन से इंसान अपने ख़ालीपन और दुखों से छुटकारा पा सकता है? क्या धन इंसान को मौत के मुँह में जाने से बचा सकता है? परमेश्वर के वचनों पर बहन लिन झिशिन की सहभागिता से, डिंग रुइलिन को जीवन के बारे में इन प्रश्नों के उत्तर साफ़ तौर पर मिलने लगते हैं। उसमें यह भी समझ आती है कि वह कौन-सी सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है जिसका इंसान को अनुसरण करना चाहिये। अंतत:, उसे आध्यात्मिक मुक्ति मिल जाती है। परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से, आख़िरकार डिंग रुइलिन जीवन में आनंद की खोज कर लेती है…

स्रोत: यीशु मसीह का अनुसरण करते हुए

The Word of the Holy Spirit | परमेश्वर के कथन “क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?” (Hindi)

परमेश्वर कहते हैं: “तुम लोग केवल स्वर्ग के अनदेखे परमेश्वर को चाहते हो और भय मानते हो और धरती पर जीते-जागते मसीह के लिए कोई सम्मान नहीं है। क्या यह भी तुम्हारा अविश्वास नहीं है? तुम सब केवल अतीत में कार्य करने वाले परमेश्वर के लिए लालायित रहते हो परन्तु आज के मसीह का सामना तक नहीं करते। ये हमेशा से “विश्वास” है जो तुम्हारे हृदय में घुलमिल जाता है, जो आज के मसीह पर विश्वास नहीं करता। मैं तुम्हारे महत्व को कम करके नहीं आंकता, क्योंकि तुम्हारे भीतर अत्यधिक अविश्वास है, तुम लोगों में बहुत ज्यादा अशुद्धि है और इसे काटकर अलग करना आवश्यक है। ये अशुद्धियां इस बात की निशानी है कि तुम सब में बिल्कुल भी विश्वास नहीं है; ये मसीह को तुम्हारे त्यागने के निशान हैं और मसीह के विश्वासघाती के तौर पर कलंक है। वे मसीह के विषय में तुम्हारे ज्ञान पर पूरी तरह से पर्दे की तरह हैं, मसीह के द्वारा प्राप्त किए जाने हेतु बाधा के समान हैं, मसीह के साथ सुसंगत होने के लिए एक रूकावट के समान हैं और यह सबूत है कि मसीह ने तुम्हें मान्यता नहीं दी है।

स्रोत: यीशु मसीह का अनुसरण करते हुए

यह वेबसाइट, “यीशु मसीह का अनुसरण करते हुए” में यीशु मसीह को जानना, स्वर्ग के राज्य का रहस्य, प्रभु की वापसी, प्रार्थना, विवाह और परिवार जैसे खंड शामिल हैं जो आपकी आस्था की राह में आने वाली उलझनों में आपकी सहायता करते हैंI

बाइबल के प्रश्नों के उत्तर।  यह कैसे समझें कि मसीह मार्ग, सत्य और जीवन है? 

प्रभु यीशु को जानें

बाइबल के प्रश्नों के उत्तर।  यह कैसे समझें कि मसीह मार्ग, सत्य और जीवन है? 

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:
आदि में वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था। यही आदि में परमेश्‍वर के साथ था” (युहन्ना 1:1-2)।

“और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्‍चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा” (युहन्ना 1:14)।

मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता” (युहन्ना 14:6)।

आत्मा तो जीवनदायक है, शरीर से कुछ लाभ नहीं; जो बातें मैं ने तुम से कही हैं वे आत्मा हैं, और जीवन भी हैं” (युहन्ना 6:63)। “बाइबल के प्रश्नों के उत्तर।  यह कैसे समझें कि मसीह मार्ग, सत्य और जीवन है? “पढ़ना जारी रखें

बाइबल के प्रश्नों के उत्तर।  हमें “दूसरे सुसमाचार” को कैसे समझना चाहिए?

बाइबल के प्रश्नों के उत्तर। हमें “दूसरे सुसमाचार” को कैसे समझना चाहिए?

संपादक की टिप्पणी: गलातियों 1:6-8 में दर्ज की गयी बातों की वजह से, कई भाई-बहन ऐसे हैं जो मानते हैं कि उन्हें प्रभु यीशु के मार्ग पर बने रहना चाहिए और किसी अन्य द्वारा प्रचारित किसी भी सुसमाचार का पालन नहीं करना चाहिए। ऐसा करना अपने धर्म का त्याग करना है। उस वक्त में, पौलुस ने इन शब्दों को किन हालात में कहा था? हमें “दूसरे सुसमाचार” को कैसे समझना चाहिए?

बाइबल कहती है, “मुझे आश्‍चर्य होता है कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह में बुलाया उससे तुम इतनी जल्दी फिर कर और ही प्रकार के सुसमाचार की ओर झुकने लगे। परन्तु वह दूसरा सुसमाचार है ही नहीं: पर बात यह है कि कितने ऐसे हैं जो तुम्हें घबरा देते, और मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ना चाहते हैं। परन्तु यदि हम, या स्वर्ग से कोई दूत भी उस सुसमाचार को छोड़ जो हम ने तुम को सुनाया है, कोई और सुसमाचार तुम्हें सुनाए, तो शापित हो” (गलातियों 1:6-8)।

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हममें से जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, वे पवित्रशास्त्र के इन पदों से अच्छी तरह से परिचित होंगे। विशेष रूप से हाल के वर्षों में, पादरियों और एल्डरों ने अक्सर इन पदों पर उपदेश दिया है, उन्होंने चेतावनी दी है कि हम प्रभु यीशु के नाम को बनाए रखें, उनके मार्ग पर बने रहें, और किसी अन्य धर्मोपदेश को नहीं सुनें, किसी अन्य द्वारा प्रचारित सुसमाचार को स्वीकार करने की तो बात ही दूर है। ऐसा न करने पर हम धर्मत्याग कर बैठेंगे और परमेश्वर के द्वारा शापित होंगे। वर्षों तक प्रभु में विश्वास रखते हुए, मैंने हमेशा इन पदों का पालन किया और जो कुछ पादरियों और एल्डरों ने कहा, उसे सुना। जब मैंने सुना कि बहुत से लोग गवाही दे रहे हैं कि प्रभु पहले ही लौट आए हैं, तब भी मैंने उनके धर्मोपदेशों को सुनने, या उनके मार्ग की जाँच करने की हिम्मत नहीं की। मुझे डर था कि “दूसरा सुसमाचार” सुनकर मैं प्रभु से विश्वासघात कर बैठूँगा। लेकिन मेरी कलीसिया उजड़ती ही जा रही थी, मेरे जीवन को किसी भी सभा या पादरी और एल्डर द्वारा दिए गए किसी भी धर्मोपदेश से पोषण नहीं मिल रहा था, अधिक से अधिक भाई-बहन सांसारिक प्रवृत्तियों का पालन कर रहे थे, वे दौलत और शोहरत की खोज में जा रहे थे, यहाँ तक कि वे हमारी सभाओं को भी व्यापार की जगहों में बदल रहे थे जहाँ व्यापारिक रिश्ते बनाये जा सकते थे। मेरी आत्मा मुरझा गई थी, जब मैं बाइबल पढ़ता था तो मुझे कोई प्रेरणा महसूस नहीं होती थी, मुझे अपनी कलीसिया की सभा में शामिल होने से कोई आनंद नहीं मिलता था। क्या मेरा अपनी कलीसिया से इस तरह हठपूर्वक चिपके रहना सचमुच परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप था? मैंने कई बार इस बारे में प्रभु से प्रार्थना की, उनसे मुझे प्रबुद्ध करने, मार्गदर्शन करने और मुझे अभ्यास का मार्ग दिखाने के लिए विनती की। “बाइबल के प्रश्नों के उत्तर।  हमें “दूसरे सुसमाचार” को कैसे समझना चाहिए?”पढ़ना जारी रखें

बाइबल अध्ययन।  मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है

 

परमेश्वर के नक़्शे-कदम

बाइबल अध्ययन। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है 

1.(मत्ती 12:1) उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से हो कर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।

2.(मत्ती12:6-8) पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, ‘मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,’ तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।

आओ पहले हम इस अंश को देखें: “उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से हो कर जा रहा था, और उस के चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।” “बाइबल अध्ययन।  मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है”पढ़ना जारी रखें

बाइबल की भविष्यवाणी। प्रकाशितवाक्य में एक नई खोज: जब प्रभु यीशु अंत के दिनों में लौटेंगे, तो उनका नाम बदल जाएगा

बाइबल की भविष्यवाणी। प्रकाशितवाक्य में एक नई खोज: जब प्रभु यीशु अंत के दिनों में लौटेंगे, तो उनका नाम बदल जाएगा

मेरी मेज पर रखी अलार्म घड़ी बता रही थी कि रात के 11 बजकर 5 मिनट हो रहे थे। मुझे आदत थी कि, रात में सोने जाने से पहले, मैं धर्मग्रन्थ की एक पद पढ़ती थी। आम तौर पर, मैं पहले से ही एक पद पढ़कर, इस समय तक सो जाया करती थी, लेकिन इस रात, मैं धर्मग्रन्थ के एक पद के कारण उलझन में थी।

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प्रकाशितवाक्य 3:12 में कहा गया है: “जो जय पाए उसे मैं अपने परमेश्‍वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम, जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है, और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा।” मैं इस पद को कई बार पहले भी पढ़ चुकी थी, लेकिन इस रात को, मेरी आँखें इस वचन “अपना नया नाम,” पर अटक गयीं थीं और इसने मुझे उलझन में डाल दिया था। मैंने विचार किया: क्या “अपना नया नाम” का अर्थ है कि अंत के दिनों में लौटने पर प्रभु यीशु का नया नाम होगा? हालाँकि, इब्रानियों की किताब में कहा गया है: “यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है” (इब्रानियों 13:8)। प्रभु यीशु का नाम नहीं बदल सकता। तो फिर प्रकाशितवाक्य में “अपना नया नाम”, इन वचनों का क्या मतलब है? क्या ऐसा हो सकता है कि अंत के दिनों में लौटने पर प्रभु यीशु का नाम बदल जाए? “बाइबल की भविष्यवाणी। प्रकाशितवाक्य में एक नई खोज: जब प्रभु यीशु अंत के दिनों में लौटेंगे, तो उनका नाम बदल जाएगा”पढ़ना जारी रखें

प्रार्थना की क्रिया के विषय में

अपने प्रतिदिन के जीवन में तुम प्रार्थना पर बिलकुल ध्यान नहीं देते। लोगों ने प्रार्थना को सदैव नजरअंदाज किया है। प्रार्थनाएँ लापरवाही से की जाती थीं, जिसमें इंसान परमेश्वर के सामने बस खानापूर्ति करता था। किसी ने भी कभी परमेश्वर के समक्ष पूरी रीति से अपने हृदय को समर्पित नहीं किया है और न ही परमेश्वर से सच्चाई से प्रार्थना की है। लोग परमेश्वर से तभी प्रार्थना करते हैं जब उनके साथ कुछ घटित हो जाता है। इन सारे समयों के दौरान, क्या तुमने कभी सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रार्थना की है? क्या तुमने कभी पीड़ा के आँसुओं को परमेश्वर के सामने बहाया है? क्या तुमने कभी परमेश्वर के सामने स्वयं को पहचाना है? क्या तुमने कभी परमेश्वर के साथ हृदय से हृदय मिलाते हुए प्रार्थना की है? प्रार्थना अभ्यास करने से आती है: यदि तुम सामान्य रीति से घर पर प्रार्थना नहीं करते हो, तब तुम्हारा कलीसिया में प्रार्थना करने का कोई अर्थ नहीं होगा, और यदि तुम छोटी-छोटी सभाओं में सामान्य रीति से प्रार्थना नहीं करते हो, तो बड़ी-बड़ी सभाओं में प्रार्थना करने में भी असमर्थ होगे। यदि तुम सामान्य रीति से परमेश्वर के निकट नहीं आते या परमेश्वर के वचनों पर मनन नहीं करते हो, तो तुम्हारे पास तब कहने के लिए कुछ भी नहीं होगा जब प्रार्थना का समय होगा—और यदि तुम प्रार्थना करते भी हो, तो बस तुम बस दिखावा करोगे, तुम सच्चाई से प्रार्थना नहीं कर रहे होगे।

सच्ची प्रार्थना

सच्चाई के साथ प्रार्थना करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है अपने हृदय में शब्दों को कहना, और परमेश्वर की इच्छा को समझकर और उसके वचनों पर आधारित होकर परमेश्वर के साथ वार्तालाप करना; इसका अर्थ है विशेष रूप से परमेश्वर के निकट महसूस करना, यह महसूस करना कि वह तुम्हारे सामने है, और कि तुम्हारे पास उससे कहने के लिए कुछ है; और इसका अर्थ है अपने हृदय में विशेष रूप से प्रज्ज्वलित या प्रसन्न होना, और यह महसूस करना कि परमेश्वर विशेष रूप से मनोहर है। तुम विशेष रूप से प्रेरणा से भरे हुए महसूस करोगे, और तुम्हारे शब्दों को सुनने के बाद तुम्हारे भाई और तुम्हारी बहनें आभारी महसूस करेंगे, वे महसूस करेंगे कि जो शब्द तुम बोलते हो वे उनके हृदय के भीतर के शब्द हैं, वे ऐसे शब्द हैं जो वे कहना चाहते हैं, और जो तुम कहते हो वह वही है जो वे कहना चाहते हैं। सच्चाई के साथ प्रार्थना करने का अर्थ यही है। सच्चाई के साथ प्रार्थना करने के बाद, अपने हृदय में तुम शांतिपूर्ण, और आभारी महसूस करोगे; परमेश्वर से प्रेम करने की सामर्थ्य बढ़ जाएगी, और तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे जीवन में परमेश्वर से प्रेम करने से अधिक योग्य और महत्वपूर्ण कुछ नहीं है—और यह सब प्रमाणित करेगा कि तुम्हारी प्रार्थनाएँ प्रभावशाली रही हैं। क्या तुमने कभी इस तरह से प्रार्थना की है?
“प्रार्थना की क्रिया के विषय में”पढ़ना जारी रखें

Hindi Christian Movie | स्वर्गिक राज्य की प्रजा | Be an Honest Man and Testify to God

बाइबल अध्ययन (Hindi Christian Movie | स्वर्गिक राज्य की प्रजा | Be an Honest Man and Testify to God)

प्रभु यीशु ने कहा, “मैं तुम से सच कहता हूँ कि जब तक तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो , तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने नहीं पाओगे” (मत्ती 18:3)। प्रभु यीशु ने हमें बताया कि केवल ईमानदार लोग ही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं; केवल ईमानदार लोग ही राज्य की प्रजा हो सकते हैं। यह फ़िल्म ईसाई चेंग नूओ के परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने और जीवन में एक ईमानदार इंसान बनने के संघर्ष की कहानी कहती है।चेंग नूओ कभी डॉक्टर हुआ करती थी। परमेश्वर में आस्था रखने के बावजूद, रोज़मर्रा के जीवन में जब उसका सामना ऐसी बातों से होता है जो उसके हितों पर चोट करती हैं, तो वह झूठ और कपट का सहारा ही लेती है। जब उसका सामना परीक्षणों और क्लेशों से होता है तो वह गलतफ़हमियाँ पाल लेती है। उसे परमेश्वर से भी शिकायत होने लगती है। लेकिन जैसे-जैसे वह सत्य की खोज करती है, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से गुज़रती है, तो उसे अपनी बेईमानी, अपने स्वार्थी और अस्थिर शैतानी प्रकृति का मूल कारण समझ में आने लगता है। वह अपने मन में छिपी झूठ और बेईमानी की प्रवृत्ति को दूर करने का संकल्प लिये सत्य की खोज पर ध्यान देने लगती है। एक बार जब चेंग नूओ जब अपना कर्तव्य निभा रही थी, तो उस दौरान चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार उसे गिरफ़्तार करके भयंकर यातना देती है। ऐसे में, चेंग नूओ झूठ बोलने के बजाय मरना बेहतर समझती है। उसे मंज़ूर नहीं कि वह परमेश्वर को नकारे। वह परमेश्वर के लिये सुंदर और ज़बर्दस्त गवाही देती है। धीरे-धीरे चेंग नूओ एक ईमानदार इंसान बन जाती है। वह परमेश्वर से सच्चा प्रेम और उसकी आज्ञा का पालन करने लगती है। तो दरअसल उसकी कहानी है क्या?

स्रोत:यीशु मसीह का अनुसरण करते हुए

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प्रार्थना का महत्व और अभ्यास

आजकल तुम लोग प्रार्थना कैसे करते हो? यह धार्मिक प्रार्थनाओं पर एक सुधार कैसे है? प्रार्थना के महत्व के बारे में दरअसल तुम लोग क्या समझते हो? क्या तुम लोगों ने इन प्रश्नों की जाँच की है? प्रत्येक व्यक्ति जो प्रार्थना नहीं करता है, परमेश्वर से दूर है, प्रत्येक व्यक्ति जो प्रार्थना नहीं करता है, वह अपनी इच्छा पर चलता है; प्रार्थना की अनुपस्थिति में परमेश्वर से दूरी और परमेश्वर के साथ विश्वासघात अंतर्निहित है। प्रार्थना के साथ तुम लोगों का वास्तविक अनुभव क्या है? अभी, परमेश्वर का कार्य पहले ही समाप्ति के निकट पहुँच रहा है और परमेश्वर और मनुष्य के बीच का सम्बन्ध मनुष्य की प्रार्थना के द्वारा देखा जा सकता है। तुम कैसा व्यवहार करते हो, जब तुम्हारे अधीनस्थ लोग उन परिणामों के लिए तुम्हारी चापलूसी और प्रशंसा करते हैं, जो परिणाम तुम अपने कार्य में लाते हो? तुम कैसी प्रतिक्रिया करते हो, जब लोग तुम्हें सुझाव देते हैं? क्या तुम लोग परमेश्वर की उपस्थिति में प्रार्थना करते हो? तुम लोग तभी प्रार्थना करते हो जब तुम्हारे पास मसले या कठिनाइयाँ होती हैं, परन्तु क्या तुम लोग उस समय प्रार्थना करते हो जब तुम्हारी परिस्थितियाँ अच्छी होती हैं, या जब तुम महसूस करते हो कि तुम्हारी सभा सफल हुई? तो तुम लोगों में से अधिकतर प्रार्थना नहीं करते हैं! यदि तुमने कोई सफल सभा की, तो तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए; तुम्हें स्तुति की एक प्रार्थना करनी चाहिए। यदि कोई तुम्हारी प्रशंसा करता है, तो तुम अहंकारी हो जाते हो, तुम महसूस करते हो कि तुम्हारे पास सत्य है, तुम ग़लत परिस्थिति में गिर जाते हो, और तुम्हारा हृदय प्रसन्न होता है. तुम्हारे पास स्तुति की एक प्रार्थना नहीं होती है, धन्यवाद की प्रार्थना तो बिल्कुल भी नहीं होती है। तुम्हारे इस परिस्थिति में गिरने का परिणाम यह होता है कि तुम्हारी अगली सभा नीरस होगी, तुम्हारे पास कहने के लिए शब्द नहीं होंगे, और पवित्र आत्मा कार्य नहीं करेगा। लोग अपनी ही परिस्थिति को नहीं समझ सकते, वे थोड़ा सा कार्य करते हैं, और फिर अपने उस कार्य के फल का आनन्द लेते हैं। एक नकारात्मक परिस्थिति में, यह बताना कठिन है कि ठीक होने के लिए उन्हें कितने दिनों की आवश्यकता होगी। इस प्रकार की परिस्थिति सब से खतरनाक है। तुम सब लोग प्रार्थना करते हो जब तुम्हारा कोई मसला होता है या जब तुम्हें चीज़ें स्पष्ट रूप से नहीं दिखाई देती हैं; तुम लोग उस समय प्रार्थना करते हो जब तुम्हें किसी के बारे में सन्देह और असमंजस होते हैं या तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव उजागर हो जाता है। तुम लोग मात्र उस समय प्रार्थना करते हो जब तुम लोग किसी चीज़ की ज़रूरत में होते हो। तुम लोगों को उस समय भी अवश्य प्रार्थना करनी चाहिए, जब तुम लोग अपने कार्य में कुछ सफलता प्राप्त करते हो। जब तुम अपने कार्य में कुछ परिणाम प्राप्त करते हो, तुम उत्तेजित हो जाते हो, और एक बार जब तुम उत्तेजित हो जाते हो, तो तुम प्रार्थना नहीं करते हो; तुम सर्वदा प्रसन्न होते हो और भीतर ही भीतर सर्वदा फँसे रहते हो। तुम लोगों में से कुछ लोग इस समय अनुशासन प्राप्त करते हैं: जब तुम खरीदारी के लिए बाहर जाते हो, और तुम किसी समस्या में फँस जाते हो और तुम्हारे साथ कुछ ग़लत हो जाता है; दुकानदार तुम्हें बहुत से कठोर वचन कहता है और तुम असहज और दबाव महसूस करते हो, और तुम अभी भी नहीं जानते कि तुमने किस तरह से परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है। वस्तुतः, तुम्हें अनुशासित करने के लिए परमेश्वर कई बार बाहरी वातावरण का उपयोग करता है; उदाहरण के लिए, वह इस प्रकार की बातों का उपयोग करता है जैसे कि कोई अविश्वासी तुम्हें कोस रहा है, या तुम्हें बेचैन करने के लिए तुम्हारा पैसा चोरी हो गया है। अन्त में, प्रार्थना करने के लिए तुम परमेश्वर की उपस्थिति में आओगे, और जब तुम्हारे प्रार्थना करते समय कुछ शब्द बाहर आएँगे। तुम पहचान जाओगे कि तुम्हारी परिस्थिति सही नहीं थी, उदाहरण के लिए, तुम स्वयं से सन्तुष्ट और प्रसन्न थे…, फिर तुम अपनी आत्म-सन्तुष्टि से घृणा महसूस करोगे। तुम्हारी प्रार्थना में वचनों के साथ-साथ तुम्हारे अन्दर की ग़लत परिस्थिति भी बदल जाएगी। जैसे ही तुम प्रार्थना करोगे, पवित्र आत्मा तुम पर कार्य करेगा; वह तुम्हें एक प्रकार की अनुभूति प्रदान करेगा और तुम्हें उस गलत परिस्थति से बाहर ले आएगा। प्रार्थना खोजने के बारे में ही नहीं है। यह ऐसा नहीं है कि जब तुम्हें परमेश्वर की आवश्यकता हो, तो तुम प्रार्थना करो, और जब तुम्हें परमेश्वर की आवश्यकता न हो तो प्रार्थना न करो। क्या तुम लोगों ने देखा है कि यदि तुम लोग बिना प्रार्थना किए एक लम्बा समय निकाल देते हो, तो यद्यपि तुम लोगों के पास ऊर्जा होती है और तुम लोग नकारात्मक भी नहीं होते हो, या तुम लोग को लगता है कि भीतर से तुम लोगों की एक विशेष रूप से सामान्य स्थिति है, तो तुम लोगों को महसूस होगा मानो कि तुम लोग स्वयं ही कार्य कर रहे हो और तुम लोग जो कुछ करते हो उसके कोई परिणाम नहीं हैं? “प्रार्थना का महत्व और अभ्यास”पढ़ना जारी रखें

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