Face to Face With God | “आते रहो अक्सर परमेश्वर के सामने तुम”

जब कभी पास हो समय तुम्हारे, बैठो ख़ामोशी से परमेश्वर के सामने तुम।
वचन पढ़ो उनका, सत्य जानो उनके, सुधारो अपने अतिक्रमण तुम।
इम्तहान आते हैं, सामना करो उनका,
जानो परमेश्वर की इच्छा को, पाओगे शक्ति तुम।
बताओ उन्हें क्या हैं ख़ामियाँ तुम्हारी, उनके सत्य को बांटो सदा तुम।
गर्वित होगी आत्मा तुम्हारी, करोगे जब उनकी आराधना तुम।
आते रहो अक्सर सामने परमेश्वर के, और विरोध न करो उनका तुम।
चोट पहुंचती है उन्हें, जब करते हो देह की चिंता तुम।
वचन पढ़ो उनका, सत्य को उनके समझो तुम।
आते रहो अक्सर सामने परमेश्वर के,
आते रहो अक्सर सामने परमेश्वर के।
इसलिये जियो पुनीत बने इंसान की तरह तुम!
कोई भी इम्तहान या न्याय आये, करेंगे काम उनकी तृप्ति के लिए हम।
आते रहो अक्सर सामने परमेश्वर के तुम।
आते रहो अक्सर सामने परमेश्वर के, जियो उनके सत्य के अनुसार तुम।हद पार कर जाएं भले ही,
प्रयास करना चाहिये कि परमेश्वर को प्रेम करें हमें।
अगर हम प्रेम करेंगे उन्हें, तो यकीनन उनकी स्वीकृति मिलेगी हमें।
करना चाहिए सत्य का अनुसरण हमें,
देनी चाहिए परमेश्वर की गवाही हमें।
यही है फ़र्ज़ हमारा जिसे निभाना चाहिए हमें।
गर्वित होगी आत्मा तुम्हारी, करोगे जब उनकी आराधना तुम।
आते रहो अक्सर सामने परमेश्वर के, और विरोध न करो उनका तुम।
चोट पहुंचती है उन्हें, जब करते हो देह की चिंता तुम।
वचन पढ़ो उनका, सत्य को उनके समझो तुम।
आते रहो अक्सर सामने परमेश्वर के, आते रहो अक्सर सामने परमेश्वर के।
इसलिये जियो पुनीत बने इंसान की तरह तुम!
कोई भी इम्तहान या न्याय आये, करेंगे काम उनकी तृप्ति के लिए हम।
आते रहो अक्सर सामने परमेश्वर के तुम।
आते रहो अक्सर सामने परमेश्वर के, जियो उनके सत्य के अनुसार तुम। इसलिये जियो पुनीत बने इंसान की तरह तुम!
कोई भी इम्तहान या न्याय आये, करेंगे काम उनकी तृप्ति के लिए हम।
आते रहो अक्सर सामने परमेश्वर के तुम।
आते रहो अक्सर सामने परमेश्वर के, जियो उनके सत्य के अनुसार तुम,
जियो उनके सत्य के अनुसार तुम, जियो उनके सत्य के अनुसार तुम।
आते रहो अक्सर सामने परमेश्वर के, जियो उनके सत्य के अनुसार तुम।

“मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना” से

ईसाई भजन खण्ड, आपके साथ ईसाई आराधना भजन वीडियो, स्तुति भजन वीडियो साथ और भी बहुत कुछ साझा करता हैI आइये हम सब मिलकर सच्चे हृदय से परमेश्वर की स्तुति करें!

यह वेबसाइट, “यीशु मसीह का अनुसरण करते हुए” में यीशु मसीह को जानना, स्वर्ग के राज्य का रहस्य, प्रभु की वापसी, प्रार्थना, विवाह और परिवार जैसे खंड शामिल हैं जो आपकी आस्था की राह में आने वाली उलझनों में आपकी सहायता करते हैंI

Hindi Christian Music Video “प्रभुजनों की प्रार्थना”

ईश्वर के बंदे उठते उसके सिंहासन के समक्ष, दिल में प्रार्थनाएं उनके।
ईश्वर दे आशीष उन्हें जो लौटे प्रभु की ओर; वे सब रोशनी में हैं जीते।
विनती है पवित्र आत्मा से करे प्रबुद्ध हमें परमेश्वर की इच्छा से,
द्वारा वचन के।
सभी लोग संजोये परमेश्वर के वचन को और वे आएँ उसे जानने।
ईश्वर दे हमें और ज्यादा उसके अनुग्रह, जिससे जीवन का स्वभाव बदले।
ईश्वर करे परिपूर्ण हमें जिससे बनें एक मन और दिल उसके साथ।
हमें अनुशासित करे जिससे हम पालन अपने कर्तव्यों का करें।
राह दिखाए रोज़ पवित्र आत्मा जिससे हों हम
परमेश्वर के साक्षी और करें प्रचार।

सब लोगों को हो ज्ञान अच्छे और बुरे का, करें पालन सत्य का।
परमेश्वर दुर्जनों को दण्डित करे और कलीसिया में शांति रहे।
अर्पण सभी करें सच्चा प्रेम परमेश्वर को जो हैं सबसे सुहावने और प्यारे।
सब अड़चन हटाए परमेश्वर जिससे सौंपे खुद को पूरा हम।
प्रभु दे ऐसा दिल जो करे उससे ही प्यार, दिल जो जाए न उससे दूर।
सभी लौट आएं परमेश्वर के समक्ष जिन्हें उसने चुना है।
सभी मिलकर गाएँ गुणगान परमेश्वर के जिसने की महिमा की प्राप्ति।
परमेश्वर रहे साथ प्रजा के अपने, हमें अपने प्रेम में जीवित रखे।
परमेश्वर रहे साथ प्रजा के अपने, हमें अपने प्रेम में जीवित रखे।
“मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना” से

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ईसाई प्रार्थना का क्या महत्व है? हम अपनी प्रार्थनाएँ कैसे करें जिससे कि परमेश्वर उन्हें सुन सके? इस खण्ड में मौजूद संसाधनों के माध्यम से आप परमेश्वर के साथ एक करीबी रिश्ता बनाने में सक्षम होंगेI

वैवाहिक विश्वासघात की छाया से बाहर कैसे निकलें?

आध्यात्मिक प्रश्नोत्तर के भाई-बहनों को नमस्कार,

मेरी शादी को बीस साल हो गए हैं। मुझे लगा कि मैं और मेरे पति एक दूसरे को समर्पित हैं। लेकिन अप्रत्याशित रूप से, मेरे पति ने विवाहेत्तर संबंध बना लिए। मैं बहुत परेशान हूँ और यह नहीं जानती कि इसका सामना कैसे करूं। मैं पूछना चाहती हूँ: वैवाहिक स्नेह इतना नाजुक क्यों होता है? मैं इस पीड़ा से कैसे बच सकती हूँ?

आपकी
मोयान

नमस्कार बहन मोयान,

आपके संदेश को देखकर, मैं समझ सकती हूँ कि आप इस वक्त कैसा महसूस कर रही हैं क्योंकि मेरे साथ भी वही हुआ है जो आपके साथ हुआ। उन अंधेरे दिनों में, यदि परमेश्वर के वचनों का मार्गदर्शन साथ नहीं होता, तो मुझे नहीं समझ आता कि आगे कैसे बढ़ना है। परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन ने मुझे यह समझने में मदद की कि वैवाहिक स्नेह इतना नाजुक क्यों होता है, और मुझे मानवीय पीड़ा की जड़ को जानने भी दिया। धीरे-धीरे, मैं अपने पति के विश्वासघात की छाया से निकल गई।

मेरे पति और मैं बचपन से ही एक-दूसरे को पसंद करते थे, हमारी कई रुचियाँ एक जैसी थीं और एक-दूसरे से कहने के लिए अंतहीन बातें थीं। मेरा परिवार, मेरे उससे शादी करने के खिलाफ था, लेकिन हमने सभी बाधाओं को पार किया और साथ रहे। हमारी शादी के बाद मेरे पति मेरे प्रति बहुत विचारशील थे, मुझ पर ध्यान देते थे। मुझे लगा कि हमारे बीच गहरा प्रेम है, इसलिए हम हमेशा खुश रहेंगे। लेकिन तभी वास्तविकता ने मुझ पर एक घातक वार किया…

मेरे पति अधिक पैसा कमाने लगे और ज़्यादा लोगों के संपर्क में आ गए, लेकिन इस कारण उनके आस-पास मतलबी दोस्त भी इकट्ठे होने लगे। एक दिन, मैंने गलती से उनका वीचैट खोल दिया और मुझे एक संदेश दिखा। इसमें, उन्होंने वास्तव में एक अन्य महिला को “प्रियतमा” कहा था। उस वक्त मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। मैं बुरी तरह से कांप रही थी। उन्होंने जीवन भर मुझसे प्यार करने की कसम खाई थी—वे किसी दूसरी महिला के साथ इस तरह प्रेमपूर्ण बातें कैसे कर सकते थे? हम इतने सालों से एक साथ थे—वे मुझे कैसे धोखा दे सकते थे? मेरे पूछताछ करने पर, उन्होंने यह स्वीकारते हुए कि उनका सच में एक नाजायज़ संबंध था, लापरवाही से कहा कि यह कोई बड़ी बात नहीं थी और उनके कई सहयोगियों के नाजायज़ संबंध थे।

उस क्षण, ऐसा लगा कि आसमान मुझ पर टूट पड़ा है। गुस्सा, शर्म और बेबसी सब मेरे दिमाग में भर गया। मैं अपने दिल के दर्द को रोक न पायी, और दहाड़े मारकर रोने लगी।

मेरे पति द्वारा विश्वासघात स्वीकार करने के बाद, मुझे लगा कि अब कुछ भी मायने नहीं रखता। मैंने खुद को सभी से दूर कर लिया और पूरे एक हफ्ते तक एक शब्द भी नहीं कहा। जैसे ही मैं अपने पति के विश्वासघात के बारे में सोचती, आँसू ऐसे बहने लगते थे जैसे खुली नहर का पानी। मैं उनसे बदला लेने के लिए उनका सारा पैसा खर्च कर देना चाहती थी, इसलिए मैंने कपड़े, जूते आदि खरीदने शुरू किए, खाने के लिए बाहर जाने लगी… लेकिन, हर बार मै उनके पैसे खर्च देने के बाद, मेरी परेशानी कम नहीं होती थी। केवल दो सप्ताह के दरम्यान, मेरा वजन 8.5 किग्रा घट गया।

पीड़ा और बेबसी में, मैंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, जो कहते हैं: “एक के बाद एक, ये सभी प्रवृत्तियाँ दुष्ट प्रभाव को लेकर चलती हैं जो निरन्तर मनुष्य को पतित करते रहते हैं, जिसके कारण वे लगातार विवेक, मानवता और कारण को गँवा देते हैं, और जो उनकी नैतिकता एवं उनके चरित्र की गुणवत्ता को और भी अधिक नीचे ले जाते हैं, उस हद तक कि हम यहाँ तक कह सकते हैं कि अब अधिकांश लोगों के पास कोई ईमानदारी नहीं है, कोई मानवता नहीं है, न ही उनके पास कोई विवेक है, और कोई तर्क तो बिलकुल भी नहीं है। तो ये प्रवृत्तियाँ क्या हैं? तुम नग्न आँखों से इन प्रवृत्तियों को नहीं देख सकते हो। जब किसी प्रवृत्ति की हवा आर-पार बहती है, तो कदाचित् सिर्फ छोटी सी संख्या में ही लोग प्रवृत्ति स्थापित करने वाले बनेंगे। वे इस किस्म की चीज़ों को करते हुए शुरुआत करते हैं, इस किस्म के विचार या इस किस्म के दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं। हालाँकि, अधिकांश लोग अपनी अनभिज्ञता के बीच इस किस्म की प्रवृत्ति के द्वारा अभी भी लगातार संक्रमित, सम्मिलित एवं आकर्षित होंगे, जब तक वे सब अनजाने में एवं अनिच्छा से इसे स्वीकार नहीं कर लेते हैं, और सभी इसमें डूब नहीं जाते हैं और इसके द्वारा नियन्त्रित नहीं कर लिए जाते हैं। ऐसे मनुष्यों के लिए जो स्वस्थ्य शरीर और मन के नहीं है, जो कभी नहीं जानते हैं कि सत्य क्या है, जो सकारात्मक एवं नकारात्मक चीज़ों के बीच अन्तर नहीं बता सकते हैं, इन किस्मों की प्रवृत्तियाँ एक के बाद एक उन सभी से स्वेच्छा से इन प्रवृत्तियों, जीवन के दृष्टिकोण एवं मूल्यों को स्वीकार करवाती हैं जो शैतान से आती हैं। जो कुछ शैतान उनसे कहता है वे उसे स्वीकार करते हैं कि किस प्रकार जीवन तक पहुँचना है और जीवन जीने के उस तरीके को स्वीकार करते हैं जो शैतान उन्हें ‘प्रदान’ करता है। उनमें सामर्थ्य नहीं है, न ही उनमें योग्यता है, प्रतिरोध करने की जागरूकता तो बिलकुल भी नहीं है।”

परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गयी कि हम इतने दर्द में इसलिए रहते हैं क्योंकि हमने शैतान की बुरी प्रवृत्तियों को स्वीकार कर लिया है। आजकल सार्वजनिक नैतिकता दिन-प्रतिदिन गिर रही है; अश्लील साहित्य हर जगह फैला हुआ है; और सभी प्रकार के गलत विचार चारों ओर बिखरे हुए हैं, जैसे “एक घरवाली रखो, और एक बाहरवाली,” और “हर दिन आनंद करो, क्योंकि ज़िन्दगी बहुत छोटी है।” ये विचार जीवन के प्रति लोगों के दृष्टिकोण और उनके प्यार के विचार को विकृत कर चुके हैं। लोग इन बुरी प्रवृत्तियों का पीछा करते हैं, और वे विवाहेत्तर संबंध बनाना और दूसरी औरत रखने को शर्म की जड़ के बजाय सक्षम होने की अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं। इतने सारे परिवार टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं, इतने सारे जोड़े प्यार और नफरत के बीच झूलते रहते हैं और खुद को इससे निकाल नहीं पाते हैं। मेरे पति ने मुझे धोखा दिया क्योंकि वे इस तरह के विचार को स्वीकार कर चुके थे। जब उन्होंने अपने आस-पास के लोगों को नाजायज़ संबंध बनाते देखा, तो उन्होंने भी वैसा ही किया। न केवल उन्हें इसका पछतावा नहीं है, बल्कि उन्हें लगता है कि यह बहुत सामान्य है। शैतानी विचारों से दूषित होकर हमने अपनी नैतिकता खो दी है और पारस्परिक स्नेह बहुत नाजुक हो गया है।

चूँकि मैंने भी कुछ शैतानी विचारों जैसे कि: “जीवन अनमोल है, लेकिन प्रेम अधिक मूल्यवान है,” “किसी का हाथ पकड़ बुढ़ापे तक साथ देना,” को स्वीकार किया था, मैं प्यार को अपनी खुशी का मुख्य मानदंड और वो एकमात्र चीज़ मानती थी जो मेरे जीवन को जीने लायक बनाता है। मैं मानती थी कि केवल जब किसी के पास मधुर प्रेम हो तभी उसका जीवन मूल्यवान और सार्थक होगा। इसलिए, मेरे पति के विश्वासघात के सामने, यह देखते हुए कि मेरी शादी, जिसके प्रबन्धन में मैंने अपने जीवन को समर्पित कर दिया था, किसी लायक न रही तो मैं निराशा में चली गयी और पूरे दिन भ्रम की स्थिति में रहती थी। मैं एक जीती-जागती लाश की तरह थी। शैतान के दर्शन के अनुसार जीने का यह परिणाम हुआ था, और इससे भी महत्वपूर्ण बात है, शैतान द्वारा मुझे पहुँचाया गया नुकसान। उत्तरजीविता के इन शैतानी नियमों के बारे में कोई सत्य, कोई समझ न होने से हम इंसान दर्द में जीने और शैतान की इच्छानुसार रौंदे जाने से नहीं बच सकते हैं।

बाद में, मैं परमेश्वर के इन वचनों को देखा, “क्योंकि परमेश्वर का सार पवित्र है; इसका अर्थ है कि केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के आरपार उज्जवल, और सही मार्ग पर चल सकते हो; केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम जीवन के अर्थ को जान सकते हो, केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम वास्तविक जीवन जी सकते हो, सत्य को धारण कर सकते हो, सत्य को जान सकते हो, और केवल परमेश्वर के माध्यम से ही तुम सत्य से जीवन को प्राप्त कर सकते हो। केवल स्वयं परमेश्वर ही तुम्हें बुराई से दूर रहने में सहायता कर सकता है और तुम्हें शैतान की क्षति और नियन्त्रण से मुक्त कर सकता है। परमेश्वर के अलावा, कोई भी व्यक्ति और कोई भी चीज़ तुम्हें कष्ट के सागर से नहीं बचा सकती है ताकि तुम अब और कष्ट नहीं सहो: यह परमेश्वर के सार के द्वारा निर्धारित किया जाता है।”

परमेश्वर के वचनों से, मैं समझ गयी कि परमेश्वर ही सत्य, मार्ग और जीवन हैं। केवल परमेश्वर ही हमें शैतान के प्रभाव से बचा सकते हैं। परमेश्वर को उम्मीद है कि हममें से हर एक खुशी से रह सकता है, उसकी आराधना कर सकता है, और उसके वचनों को सुन सकता है जबकि शैतान—जो लोगों को मज़े के लिए भ्रष्ट और प्रताड़ित करता है—चाहता है कि हम दर्द में जियें। केवल जब हम सत्य का अनुसरण करते हैं, इसे जीवन के रूप में प्राप्त करते हैं, तभी हम शैतान द्वारा मूर्ख बनाए जाने से बच सकते हैं और खुद को दर्द से मुक्त कर सकते हैं। मैंने इस तथ्य पर विचार किया कि चूँकि मुझे इस बात की समझ नहीं थी कि शैतान, मानवजाति को भ्रष्ट करने के लिए कौन से साधनों का उपयोग करता है, मैं अपने पति के विश्वासघात की छाया में जी रही थी, अतीत के कैद में थी और खुद को यातना देती थी। मेरे जीवन के उस दौर ने मेरे टुकड़े-टुकड़े कर दिए। लेकिन परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में, मैंने स्पष्ट रूप से देखा कि इन बुरी प्रवृत्तियों से लोगों को क्या कष्ट हुए थे। मुझे ये भी महसूस हुआ कि मैं और मेरे पति, दोनों शैतान की बुरी प्रवृत्तियों का शिकार थे। इस तरह, धीरे-धीरे मैं अपने पति के विश्वासघात की छाया से निकल गई।

बाद में, मैं कलीसिया में सक्रिय रूप से अपने कर्तव्यों का पालन करने लगी और अब एक समृद्ध जीवन जी रही हूँ।

बहन मोयान, मुझे नहीं पता कि मेरा अनुभव आपको आपके दर्द से बाहर निकालने में मदद कर पायेगा या नहीं, लेकिन मुझे आशा है कि अब आप परमेश्वर के वचनों से स्पष्ट रूप से मानवजाति को दूषित करने वाली इन बुरी प्रवृत्तियों के परिणामों को देख सकती हैं। शैतान की चाल में कभी न फंसें, और परमेश्वर के वचनों के अनुसार जियें। परमेश्वर आप पर कृपा करें!

आपकी,
आध्यात्मिक प्रश्नोत्तर

यह वेबसाइट, “यीशु मसीह का अनुसरण करते हुए” में यीशु मसीह को जानना, स्वर्ग के राज्य का रहस्य, प्रभु की वापसी, प्रार्थना, विवाह और परिवार जैसे खंड शामिल हैं जो आपकी आस्था की राह में आने वाली उलझनों में आपकी सहायता करते हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ें, आप जीवन के कई रहस्यों के बारे में खोज पाएंगे।

बच्चों की शिक्षा: मैं अब अपनी बेटी की शिक्षा के लिए उस पर कोई दबाव नहीं डालती और हम पहले से काफ़ी ज़्यादा करीब हैं

लेक्सिन, हांगकांग

प्रस्तावना

“माँ, आप मेरी पढ़ाई को लेकर इतनी सख्त हुआ करती थीं कि मेरे पास खेलने के लिए भी समय नहीं होता था। आप पहले से कितनी बदल गयी हैं, अब आप बहुत प्यार से बोलती हैं। माँ, मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ।” बगल में लेटी, अपनी मासूम और उत्साह से भरी छोटी बच्ची को खुशी से ऐसा कहते हुए सुनकर उस युवा माँ का चेहरा आनंद से दमकने लगा।

इस युवा मां का नाम लेक्सिन है। जब हम उसकी बेटी की सरल अभिव्यक्ति सुनते हैं, तो हम यह समझ सकते हैं कि उनका संबंध पहले इतना सामंजस्यपूर्ण नहीं था, क्योंकि लेक्सिन अपनी बेटी के पर पढ़ाई को लेकर दबाव डालती थी। तो इस माँ-बेटी की कहानी क्या है? और लेक्सिन ने अपनी बेटी को शिक्षित करने के तरीके को कैसे बदला और अपनी बेटी की प्रशंसा कैसे पायी? कृपया अपनी बेटी को शिक्षित करने के लेक्सिन के अनुभवों को पढ़ें।

नवजात बच्ची से बड़ी उम्मीदें

चूँकि मैंने खुद बहुत उच्च स्तर की शिक्षा नहीं पाई थी, इसलिए ‘ज्ञान आपके भाग्य को बदल सकता है,’ और ‘अन्य बातों के अध्ययन का मूल्य छोटा है, पुस्तकों का अध्ययन उन सभी में सबसे उत्कृष्ट है,’ जैसे विचारों और दृष्टिकोण के प्रभाव में आकर मैंने हमेशा ये आशा की थी मेरा बच्चा बड़ा होकर एक शानदार छात्र बनेगा और उसकी भविष्य की संभावनाएं अच्छी होंगी। मैंने सुना था कि प्रसवपूर्व अभ्यास से बच्चे अधिक बुद्धिमान बनते हैं, इसलिए जब मैं गर्भवती थी, मैंने बच्चों की कविताओं की बहुत सारी किताबें खरीदीं और संगीत के साथ प्रसवपूर्व अभ्यास शुरू किया। मैं कुछ विशेष खाद्य पदार्थ भी लेने लगी जो भ्रूण के मस्तिष्क के विकास को बढ़ावा देते हैं। अपनी बेटी के जन्म के बाद, मैंने उसके कॉलेज जाने की लागतों की तैयारी के लिए कुछ शिक्षा बीमा करा लिए। जब वह 1 वर्ष की थी, मैं आस-पास पूछने लगी कि कौन सा किंडरगार्टन, प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय सबसे अच्छा है ताकि मैं उसके भविष्य की राह तैयार कर सकूँ। और इस तरह, मैं हर वक्त अपनी बेटी के भविष्य के लिए योजनाएं बना रही थी। मुझे इस बात का डर था कि अगर मैंने अभी चीजों को ठीक से व्यवस्थित नहीं किया, तो इससे उसके भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

दबाव बढ़ाते जाने से नतीजे मेरी मंशा के विपरीत हो गये

लेकिन चीजें उतनी आसानी से नहीं चल रही थीं जितनी मैंने कल्पना की थी। किंडरगार्टन में, मेरी बेटी गणित में खराब अंक पा रही थी। प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश पर इस बात का असर न पड़े इसलिए मैंने फौरन उसे एक मानसिक गणित की कक्षा में प्रवेश दिला दिया, लेकिन हर बार जब मैं उसे कक्षा में ले जाती, तो वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगती थी और कक्षा में नहीं जाती थी। अपनी पढ़ाई के साथ उसे इस तरह संघर्ष करते देर, मुझे भी बुरा लगा, और मैंने मन में सोचा: “मेरी बेटी अभी बहुत छोटी है। क्या उसे इस तरह से पढ़ने के लिए मजबूर करने की कोशिश करना गलत है?” लेकिन फिर मैंने सोचा, “अगर मेरी बेटी की नींव अच्छी नहीं हुई, तो वह गणित में खराब अंक के कारण अच्छे स्कूल में दाखिला नहीं पायेगी। फिर यह उसके मिडिल स्कूल, उसके बाद कॉलेज में दाखिले पर भी असर डालेगा, फिर भविष्य में उसके लिए क्या संभावनाएँ होंगी? नहीं, मैं उसके गुस्से को रास्ते में नहीं आने दूँगी। मैं उसकी भलाई के लिए ही ये सब कर रही हूँ।” और इसलिए, हर बार जब हम कक्षा में जाते, तो मुझे उसे बहुत मनाना पड़ता और वास्तव में उसे धक्के देकर कक्षा में बिठाना पड़ता था।

कुछ दिनों के बाद, मुझे पता चला कि मेरी बेटी के गणित के अंक बेहतर नहीं हो रहे हैं, और मैं बहुत चिंतित हो गयी। मैंने सोचा कि कड़ी मेहनत किसी भी प्राकृतिक क्षमता की कमी को पूरा कर सकती है, इसलिए मैंने उससे कहा कि वह हर दिन गणित के फॉर्मूले याद करे और जब मैं उसे उसके होमवर्क में गलतियाँ करते देखती, तो मैं उन्हें तुरंत ठीक कर देती थी। कभी-कभी, वह कुछ समय के लिए खेलना चाहती थी, लेकिन मैं उसके बजाय उसे सिखाती रहती थी। उसने जो सवाल गलत किए होते थे, उन्हें पूरी तरह से मिटाकर उन्हें तब तक फिर से करने को कहती थी जब तक वो उन्हें सही से नहीं कर लेती थी। जब मैं अन्य अभिभावकों को अपने बच्चों को प्रसिद्ध स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए अनेक प्रकार की कक्षाओं में डालते देखती थी, तो मुझे डर लगता था कि मेरी बेटी पिछड़ रही है, और इसलिए मैंने उसके लिए एक सख्त अध्ययन कार्यक्रम तैयार किया: उसके शिक्षकों के दिए पाठों को पूरा करने के बाद, हर दिन उससे कई अतिरिक्त अध्ययन अभ्यास करने को कहा और उसके लेखन के बहुत साफ़-सुथरे होने पर भी बहुत ज़ोर दिया। इसलिए मेरी बेटी अक्सर गुस्सा करती और कहती “मम्मी मैं लिख-लिख कर थक गयी हूँ। क्या मैं थोड़ी देर खेलने के बाद पढ़ सकती हूँ?” ये सुनकर मैं अपना धीरज खो देती और कहती, “नहीं! अभी भी तुम्हें बहुत से पाठ पढ़ने हैं। देखो तुम्हारी फलां-फलां सहपाठिनी के तौर-तरीके कितने अच्छे हैं। वह पढ़ाई में रूचि लेती है और हर दिन अपने सारे सबक पूरे करती है। तुम्हारी तरह नहीं, जिसे हर वक्त खेलने की पड़ी रहती है!” मेरे कड़े रुख को देखकर, मेरी बेटी को लगता था मैं उसके साथ गलत कर रही हूँ और वो रोने लगती थी। उसे इस हाल में देखकर, मैं अपने स्वर को नरम करके उसे बहलाने की कोशिश करते हुए कहती, “मैं तुम्हारे भले के लिए ऐसा कर रही हूँ। क्या तुम भी बड़े होकर पर मेरे समान अनपढ़ रहना चाहती हो, जिससे तुम केवल एक ऐसी नौकरी पा सको, जो थका देने वाली और कठिन हो?” मेरी बेटी इस पर कोई जवाब नहीं देती थी, बस अपनी आँखें पोंछती और अपने पाठों को पढना जारी रखती थी। जब मैंने सोचा कि वह हाल ही में अपनी पढ़ाई के कारण कितनी दबाव में है और वह अक्सर परेशान होकर और अपना आपा खो देती है, तो मुझे बहुत बुरा लगा। लेकिन तब मैंने यह सोचकर खुद को तसल्ली दी: “समाज में इतनी अधिक होड़ लगी है। एक अच्छे कॉलेज से डिप्लोमा किये बिना, लोगों को एक अच्छी नौकरी नहीं मिल सकती है अगर आज मैं अपनी बेटी के साथ थोड़ी कड़ाई बरतती हूँ तो, भविष्य में उसकी अच्छी संभावनाएं होंगी। जब वह बड़ी हो जाएगी, तो वह मेरे सभी श्रमसाध्य प्रयासों को समझ जाएगी!”

लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, मैंने पाया कि मेरी बेटी जो हमेशा से खुशमिजाज रही थी, बिल्कुल चुप होती जा रही थी। उसे अब पड़ोसियों का अभिवादन करना पसंद नहीं था, और हम एक-दूसरे से दूर होते जा रहे थे। जब मैं घर आती, तो ऐसा लगता जैसे उसने मुझे देखा ही न हो, और वह मुझे पूरी तरह से अनदेखा कर देती थी, जबकि इससे पहले वह दौड़ कर मुझे गले लगाती थी और मुझे उस दिन स्कूल में क्या क्या हुआ, सब बताती थी। उसमें आ रहे इन बदलावों को देखकर मुझे बहुत दुःख हुआ।

एक बार एक पैरेंट टीचर मीटिंग में, उसकी अध्यापिका ने मुझसे पूछा, “क्या आपने ध्यान दिया है कि हाल में आपकी बेटी अब ज्यादा बातें नहीं करती और वह अपनी पढ़ाई में पिछड़ रही है? शायद आप उस पर बहुत अधिक दबाव डाल रही हैं। आपको पता होना चाहिए कि जब बच्चे खुश होते हैं तो वे तेजी से सीखते हैं, इसलिए अभी से उस पर इतना दबाव न डालें और चीजों को अपने ढंग से होने दें!” अध्यापिका की इन बातों को सुनकर, मैं परेशान और थोड़ी निराश हो गयी। मैंने सोचा: “यकीनन उसकी पढ़ाई को लेकर मेरा कड़ा व्यवहार ही मेरी बेटी के गुमसुम हो जाने का कारण है, लेकिन मैंने ऐसा इसलिए किया कि उसके बेहतर अंक आ सकें। मैंने कभी नहीं सोचा था… अब मैं क्या करूँ?” जब मुझे इस बात का ध्यान आया कि मेरी बेटी जल्द ही प्राथमिक विद्यालय में जाने के लिए परीक्षा देने वाली है, तो मैं चिंतित महसूस करने लगी, कि वह एक अच्छे स्कूल में दाखिला नहीं पा सकेगी। लेकिन मैं उस पर और अधिक दबाव डालना नहीं चाहती थी, कि कहीं मैं उसके लिए जो चाहती थी, परिणाम उसके विपरीत न हो जाये। कुछ समय के लिए, मुझे विरोधाभास महसूस हुआ और मुझे नहीं समझ आ रहा था कि अच्छे नतीजों के लिए मुझे क्या करना है …

परमेश्वर मेरी बेटी की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है
अगस्त 2017 में, मैं सौभाग्यशाली थी कि मैंने अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया। एक सभा में, मैंने अपनी बहन से खुलकर बात की और उनसे इस बारे में संगति की कि मुझे अपनी बेटी को कैसे शिक्षित करना चाहिए। यह एक ऐसा मामला था जो मेरे लिए हमेशा से सिरदर्द रहा था। उस बहन ने मेरे साथ परमेश्वर के वचन का एक अंश साझा किया, “लोग जानते हैं कि वे इस जीवन में निर्बल और आशाहीन हैं, कि उनके पास औरों से विशिष्ट होने का अन्य अवसर, और अन्य आशा नहीं होगी, और यह कि उनके पास अपने भाग्य को स्वीकार करने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं है। और इसलिए वे अगली पीढ़ी पर अपनी समस्त आशाओं, अपनी अतृप्त इच्छाओं, और आदर्शों को डाल देते हैं, यह आशा करते हुए कि उनकी संतान उनके सपनों को हासिल करने में और उनकी इच्छाओं को साकार करने में उनकी सहायता कर सकती हैं; यह कि उनकी बेटियाँ और बेटे परिवार के नाम को गौरवान्वित करेंगे, और महत्वपूर्ण, समृद्ध, या प्रसिद्ध हो जाएँगे; संक्षेप में, वे अपने बच्चों के सौभाग्य को बहुत ऊँचा देखना चाहते हैं। लोगों की योजनाएँ और कल्पनाएँ उत्तम होती हैं; क्या वे नहीं जानते हैं कि उनके बच्चों की संख्या, उनके बच्चों का रंग-रूप, योग्यताएँ, इत्यादि, यह तय करना उनके हाथ में नहीं है, यह कि उनके बच्चों के भाग्य उनकी हथेलियों में नहीं है? मनुष्य अपने स्वयं के भाग्य के स्वामी नहीं हैं, फिर भी वे युवा पीढ़ी के भाग्य को बदलने की आशा करते हैं; वे अपने स्वयं के भाग्य से बच निकलने में निर्बल हैं, फिर भी वे अपने बेटे और बेटियों के भाग्य को नियन्त्रित करने की कोशिश करते हैं। क्या वे अपने आप को बहुत अधिक मूल्यांकित नहीं कर रहे हैं? क्या यह मनुष्य की मूर्खता और अज्ञानता नहीं है?” (“स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III”)।

परमेश्वर के वचन बहुत वास्तविक हैं—यह बिल्कुल वैसा ही था जैसा मैं सोच रही थी। मैंने हमेशा यही सोचा था कि, चूँकि मेरे पास कॉलेज की कोई डिग्री नहीं थी, इसलिए मेरे पास जीवन में आगे निकलने का कोई अवसर नहीं था, और इसलिए मैंने अपनी सारी उम्मीदें अपनी बेटी पर लगा दीं। मैं अपनी बेटी को अच्छी तरह से प्रशिक्षित करने के लिए अपने स्वयं के प्रयासों पर निर्भर रहना चाहती थी, उसके बचपन में ही उसके लिए अच्छी नींव रखना चाहती थी, ताकि भविष्य में वह एक अच्छे कॉलेज में प्रवेश पा सके और उसके भविष्य की संभावनाएं अच्छी हों। इसलिए, अपनी बेटी के जन्म से पहले ही, मैंने प्रसवपूर्व अभ्यास किये। और उसके स्कूल जाना शुरू करने के बाद, मैंने हर छोटी से छोटी बात का ध्यान रखा, उस पर दबाव डाला, उसे उस अध्ययन कार्यक्रम के अनुसार पढ़ाई करने पर मजबूर किया, जो मैंने उसके लिए तैयार किया था। अंत में मैंने उस पर बहुत अधिक दबाव डाल दिया, जिससे न केवल उसके अंकों में सुधार नहीं हुआ, बल्कि उसका व्यक्तित्व भी अधिकाधिक एकाकी और असामाजिक हो गया, उसने वो ख़ुशी खो दी जो एक मासूम, भोली बच्ची के पास होनी चाहिए, और वह लगातार मुझसे दूर होती जा रही थी। यह सब मेरे परमेश्वर की संप्रभुता को न समझने और उसके बजाय अपनी बच्ची के अंकों में सुधार करने के लिए अपनी क्षमताओं पर भरोसा करने के कारण हुआ था। अब मुझे समझ में आया कि लोगों की नियति बहुत पहले परमेश्वर द्वारा शासित और पूर्वनियत की गयी है, और भविष्य में मेरी बच्ची की संभावनाएँ अच्छी होंगी या नहीं, यह मेरे ऊपर नहीं है—यह सब परमेश्वर के हाथों में है। मेरा अपने भाग्य पर कोई नियंत्रण नहीं है, फिर भी मैं अपने प्रयासों से अपनी बेटी की नियति को बदलना चाहती थी। मैं वास्तव में बहुत अभिमानी, अज्ञानी और मूर्ख थी!

परमेश्वर के वचन मुझे सभी पीड़ाओं के स्त्रोत के बारे में बताते हैं

बाद में, मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा, “जहाँ तक बच्चों की बात है, सभी माँ-बाप आशा करते हैं कि उनके बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त करेंगे और वे किसी दिन आगे निकलेंगे, समाज में उनकी एक जगह होगी और उनके पास एक स्थिर आय और प्रभाव दोनों होंगे—इस तरह वे अपने परिवार का नाम रोशन करेंगे। हर किसी का यही दृष्टिकोण होता है। क्या ‘बेटा योद्धा बने और बेटी परी बने’ यह दृष्टिकोण रखना सही है? हर कोई चाहता है कि उनके बच्चे एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में जाएं, उच्च शिक्षा पाएं। वे सोचते हैं कि डिग्री प्राप्त करने के बाद वे भीड़ से अलग हो जायेंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने दिल में, हर कोई ज्ञान को पूजता है, यह विश्वास करता है कि ‘अन्य बातों के अध्ययन का मूल्य छोटा है, किताबों का अध्ययन उन सभी में सबसे उत्कृष्ट है।’ उस पर, आधुनिक समाज में प्रतिस्पर्धा विशेष रूप से भयंकर है, और एक डिग्री के बिना, तुम्हें एक वक्त का खाना नसीब होगा, इस बात की भी गारंटी नहीं है। इस बारे में हर कोई ऐसे ही सोचता है। अर्थात, तुम जो सीखते हो और जिस तरह की शैक्षिक पृष्ठभूमि हासिल करते हो, वह तुम्हारी आजीविका, तुम्हारे भविष्य का निर्धारण करेगा। दूसरे शब्दों में, लोग जीवन भर जीने के लिए इस चीज़ के भरोसे रहना चाहते हैं, और वे इसे विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं। यही कारण है कि सभी लोग अपने बच्चों के लिए, शीर्ष के विश्वविद्यालय में प्रवेश और उच्च शिक्षा पाने को सर्वोच्च प्राथमिकता वाली सबसे महत्वपूर्ण बात समझते हैं” (“पथ से भटके अपने विचारों को जानकर ही तुम अपने बारे में जान सकते हो”)।

क्या परमेश्वर के वचनों उन्हीं विचारों को उजागर नहीं करते जो मैंने रखे थे? ‘ज्ञान आपके भाग्य को बदल सकता है’ और ‘अन्य बातों के अध्ययन का मूल्य छोटा है, किताबों का अध्ययन उन सभी में सबसे उत्कृष्ट है,’ इन विचारों के प्रभाव के तहत, मेरा मानना था कि, अगर कोई अच्छा भविष्य बनाना चाहता है, तो उसके लिए उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त करना और अच्छे कॉलेज में प्रवेश पाना ज़रुरी था। इसीलिए, मैंने अपनी बेटी से सख्ती की और उस पर पढ़ाई के लिए दबाव डाला, कक्षा में उसमें जिस भी चीज़ की कमी थी मैं उससे उसे पूरा करवाती थी, और मुझे उसकी पसंद, नापसंद की परवाह नहीं थी। जब वह मेरे निर्धारित लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाती थी, तो मैं उसे सभी तरह के अध्ययन अभ्यास करने के लिए मजबूर कर देती थी, उसे खेलने का कोई समय नहीं देती थी। और उसके शिकायत करने पर, उससे बहुत प्यार करने के बावजूद, उस सोच से प्रेरित होने के कारण मैं उसकी भावनाओं पर कोई ध्यान नहीं देती थी। मैं यह विश्वास करती थी कि मैं जो कुछ भी कर रही हूँ वह उसके अच्छे के लिए है, और मैं उसे पढ़ाई के लिए मजबूर करती रही। अंत में, मैंने उसे बस दर्द दिया, अंतत: वह अधिकाधिक अंतर्मुखी और एकाकी बन गयी। मैंने सोचा कि मेरे जैसे कितने माँ-बाप थे जो नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे शुरूआत होने से पहले ही असफल हो जाएं, और इसलिए उन्होंने बहुत ही कम उम्र में अपने बच्चों का दाखिला हर प्रकार के अध्ययन और रूचि कक्षाओं में करा दिया था और अनजाने में उन पर हद से अधिक दबाव डाल दिया था। इसका नतीजा यह होता है कि बच्चे इतना बोझ उठाने में नाकाम रहते हैं। कुछ निराशा में डूब जाते हैं और कुछ इमारतों से कूद कर आत्महत्या करके अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं। क्या इस दुखद घटना का कारण लोगों का इन गलत विचारों और धारणाओं के अनुसार जीना नहीं है? क्या यह शैतान द्वारा लोगों को नुकसान पहुँचाने और भक्षण करने का परिणाम नहीं है? जब मैं यह सब सोच रही थी, तभी मैंने अचानक प्रकाश देखा। वास्तव में इन गलत विचारों के कारण, जिनकी शैतान हमें शिक्षा देता है, हम आँख बंद करके अपने बच्चों पर अध्ययन करने के लिए दबाव बनाते हैं, और वे हमारे सारे दर्द का स्रोत हैं, और मुख्य अपराधी हैं जो हमारे बच्चों को आपदा के कगार पर धकेल देते हैं। एक बार जब मैंने इन बातों को समझ लिया, तो मैंने अपने पुराने गलत विचारों को त्याग देने और अब अपनी बेटी को पढ़ाई के लिए मजबूर न करने का फैसला किया। मैं केवल अपनी बेटी के भविष्य को परमेश्वर को सौंपना चाहती थी, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं का पालन करना और एक देखभाल करने वाली माँ बनना चाहती थी।

एक ध्यान रखने वाली माँ बनने और अपने बच्चे को शिक्षित करने का सही तरीका

परमेश्वर की संप्रभुता क्र पालन करते हुए, मैं सहज और मुक्त महसूस करती हूँ
इसके तुरंत बाद, मेरी बेटी को प्राथमिक विद्यालय की प्रवेश परीक्षा देनी थी। जब मैंने अन्य माता-पिताओं को अपने बच्चों को एक अच्छे स्कूल में प्रवेश पाने हेतु पहली कक्षा में प्रवेश के प्रशिक्षण के लिए साक्षात्कार कक्षाओं में दाखिला दिलाते हुए देखा, तो मैंने सोचा कि शायद मुझे भी अपनी बेटी को इन कक्षाओं में भेजना चाहिए। इस तरह, मेरी बेटी, अपने साक्षात्कार के समय एक अच्छी छाप छोड़ पायेगी, उसकी प्रतिभा अन्य सभी छात्रों से अलग दिखेगी, और एक अच्छे स्कूल में दाखिला पाने की उसकी उम्मीद बढ़ेगी। जब मैं और मेरे पति इस मामले पर चर्चा कर रहे थे और इसकी तैयारी कर रहे थे, तब मुझे एहसास हुआ कि मैं एक बार फिर से अपनी बेटी की नियति को बदलने के लिए ज्ञान का उपयोग करने की कोशिश कर रही थी। मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा, “योग्यता, बौद्धिक स्तर, और संकल्प-शक्ति में भिन्नताओं की परवाह किए बिना, भाग्य के सामने सभी लोग एक समान हैं, जो महान और तुच्छ, ऊँचे और नीचे, तथा उत्कृष्ट और निकृष्ट के बीच कोई भेद नहीं करता है। कोई किस व्यवसाय की खोज करता है, कोई आजीविका के लिए क्या करता है, और कोई जीवन में कितनी धन-सम्पत्ति संचित करता है, ये उसके माता-पिता, उसकी प्रतिभाओं, उसके प्रयासों या उसकी महत्वाकांक्षाओं के द्वारा तय नहीं किए जाते हैं, बल्कि सृजनकर्ता के द्वारा पूर्वनिर्धारित किए जाते हैं” (“स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III”)।

परमेश्वर के वचनों ने मुझे फिर से याद दिलाया कि कोई व्यक्ति अपने जीवन में क्या करेगा और उसके पास एक अच्छा भविष्य होगा या नहीं, इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि उनके पास कितना ज्ञान है या वे कितने सक्षम हैं, इसके बजाय सब कुछ सृष्टिकर्ता द्वारा व्यवस्थित और आयोजित है। मैंने अपने भाई के सहपाठी के बारे में सोचा जो कॉलेज खत्म कर लेने के बाद भी नौकरी नहीं पा सका था, इसलिए केवल अपने गृह नगर में एक छोटे से स्टाल पर चीजें बेच रहा था। मेरी एक सहकर्मी ने कॉलेज से मीडिया की पढ़ाई पूरी की थी लेकिन अंतत: एक रेस्तरां में वेट्रेस का काम कर रही थी। जबकि मेरे पिताजी के सहपाठियों में से एक ने मिडिल स्कूल भी पूरा नहीं किया था और फिर भी संपत्ति बाजार में एक बड़ा नाम बन गया था। ये सभी तथ्य दर्शाते हैं कि हर किसी की नियति परमेश्वर के हाथों में है, और ज्ञान रखने से किसी की भविष्य की संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ता है। एक बार जब मैंने परमेश्वर की इच्छा को समझ लिया, तो मैं जल्दी से परमेश्वर के सामने आयी और प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! मेरी बेटी प्राथमिक स्कूल की प्रवेश परीक्षा देने वाली है और मैं अभी भी “ज्ञान आपके भाग्य को बदल सकता है,” और “अन्य बातों के अध्ययन का मूल्य छोटा है, किताबों का अध्ययन उन सभी में सबसे उत्कृष्ट है”, जैसे शैतानी विचारों और धारणाओं में जी रही हूँ और ज्ञान का उपयोग कर उसकी नियति बदलना चाहती हूँ। हे परमेश्वर! मैं ऐसा करते रहना नहीं चाहती, इसके बजाय मैं अपनी बेटी के भविष्य को आपके हाथों में रखना चाहती हूँ। चाहे मेरी बेटी जिस भी स्कूल में प्रवेश पाये, सब बातों के पीछे आपकी भली इच्छा होती है, मैं आपके आयोजन और व्यवस्थाओं को समर्पित होना चाहती हूँ।” प्रार्थना करने के बाद, मैंने बहुत अधिक आराम महसूस किया, और मैंने अपनी बेटी को साक्षात्कार प्रशिक्षण कक्षाओं में दाखिल नहीं कराया।

फिर कुछ ऐसा हुआ जो सभी अपेक्षाओं से परे था। जब स्कूलों ने सभी सफल उम्मीदवारों की अपनी सूची प्रकाशित की, तो मुझे अचानक उस स्कूल से कॉल आया, जो मेरी पहली पसंद था, और प्रधानाध्यापक ने कहा कि वह मेरी बेटी से मिलना चाहते हैं। मुझे लगा कि यह बहुत अजीब बात थी क्योंकि मेरी बेटी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि उसने अपनी परीक्षा में बहुत अच्छा नहीं किया है और उसने बहुत सारे सवालों के जवाब नहीं दिए हैं। और मेरी बेटी की साथ पढ़ने वाली सबसे साथी को इस स्कूल ने नहीं लिया था, तो प्रधानाध्यापक हमें क्यों तलाश रहे थे? जब हम स्कूल पहुंचे, तो प्रधानाध्यापक ने हमें बताया कि मेरी बेटी की परीक्षा के अंक काफी औसत थे, और वे उसे परीक्षा देने का एक और मौका देना चाहते हैं। मुझे यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ—यह प्रधानाध्यापक, जो हमेशा से उच्च अंकों की मांग करते रहे हैं, अप्रत्याशित रूप से मेरी बेटी को परीक्षा देने का एक और मौका देने के लिए तैयार हो गया था! बाद में, मेरी बेटी ने फिर से परीक्षा दी और वास्तव में उस स्कूल में उसका चयन हो गया। इस अनुभव के बाद, मैं और भी निश्चित हो गयी कि मेरी बेटी की किस्मत परमेश्वर के हाथों में है, और वो कुछ ऐसा नहीं है जो मैं उसके लिए नियत कर सकती थी।

परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करते हुए मैं और मेरी बेटी करीब आ गये

परमेश्वर की अद्भुत व्यवस्थाओं का अनुभव करने के बाद, मैं अब अपनी बेटी की नियति को ज्ञान के माध्यम से बदलना नहीं चाहती हूँ, बल्कि केवल उसे परमेश्वर के हाथों में रखने की कामना करती हूँ, प्रकृति को अपने ढंग से काम करने देते हुए अपनी बेटी को खुशी से बढ़ने देना चाहती हूँ। बाद में, मैंने अपनी बेटी को शिक्षित करने के तरीके को बदल दिया और अब में ज़बरदस्ती यह मांग नहीं करती हूँ कि वह अध्ययन कक्षाओं में भाग ले या पढ़ाई के अलावा अन्य अभ्यासों में भाग ले। कभी-कभी मेरी बेटी अपना होमवर्क पूरा करने से पहले बाहर जाकर खेलना चाहती थी, तो मैं उसके साथ बात करती और कहती, “जाओ आधे घंटे के लिए खेलो और फिर अपना होमवर्क पूरा कर लो, ठीक है?” यह सुनकर मेरी बेटी खुशी से सिर हिला देती थी। यकीनन कुछ देर के बाद, मेरी बेटी अपने मन से वापस आकर अपना होमवर्क करने लगती थी, और उसका रवैया पहले की तुलना में कहीं अधिक ईमानदार था। कुछ समय के बाद, मेरी बेटी के गणित के अंकों में सुधार हुआ, और वह पहले की तरह ही खुश और जीवंत हो गई थी।

अब मेरी बेटी परमेश्वर में मेरा विश्वास साझा करती है, और हर दिन, दिल शांति और आनंद भरकर हम एक साथ भजन गाते हैं और परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं। जैसे-जैसे समय बीत रहा है उसके साथ मेरा संबंध अधिक से अधिक सामंजस्यपूर्ण होता जा रहा है। मैं जानती हूँ कि ये सब परमेश्वर के कर्म हैं, और ये परमेश्वर के ही वचन हैं जो मुझे अपनी बच्ची को शिक्षित करने के सही रास्ते पर ले आये हैं। परमेश्वर का धन्यवाद!

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Hindi Gospel Video “परमेश्वर का नाम बदल गया है?!” क्लिप 4 – क्या बचाया जाना और शुद्ध किया जाना एक ही बात है?

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बाइबल की भविष्यवाणी खण्ड, प्रभु की वापसी की भविष्यवाणियों—छुपी हुई भविष्यवाणियों, अंत के दिनों के न्याय की भविष्यवाणियों के साथ और भी बहुत कुछ उपलब्ध कराता है, और उन भविष्यवाणियों के पीछे के वास्तविक अर्थ की व्याख्या करता है।

बाइबिल के उपदेश आपको बाइबल की गहराई में जाने और परमेश्वर की इच्छा को समझने में मदद करता है।

“कहाँ है घर मेरा?” क्लिप – केवल परमेश्वर ही मानवजाति को बचा सकता है और हमें पीड़ा से मुक्त कर सकता है

Hindi Christian Movie “कहाँ है घर मेरा?” क्लिप – केवल परमेश्वर ही मानवजाति को बचा सकता है और हमें पीड़ा से मुक्त कर सकता है

मानवीय जीवन में कष्ट क्यों क्यों होते हैं? बहुत से लोग इस प्रश्न से जूझते हैं लेकिन उन्हें कभी इसका जवाब नहीं मिल पाता। वेन्या और उसके परिवार का सामना एक अप्रत्याशित स्थिति से होता है, जिससे वे मानवीय रिश्तों के उतार-चढ़ाव का पूर्ण अनुभव करते हैं। अंत में उन्हें, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से लोगों के जीवन में मौजूद कष्टों की जड़ का पता चलता है, वे अपने दुःख-दर्द से छुटकारा पाने और सच्ची ख़ुशी प्राप्त करने का तरीका जान पाते हैं। ईसाई फ़िल्म, कहाँ है मेरा घर, से “केवल परमेश्वर ही मानवजाति को बचा सकता है और हमें पीड़ा से मुक्त कर सकता है” नामक यह अद्भुत क्लिप, जवाब पाने में आपकी सहायता करेगी।

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प्रभु की वापसी का स्वागत करने के लिए एक अति महत्वपूर्ण कदम

एक लेख है, जिसका शीर्षक है “सीपी की जाँच।” यह एक ऐसे लड़के की कहानी है, जिसे सीपियाँ बहुत पसंद थीं। एक दिन, उसकी माँ घर पर सीपियों का एक बड़ा झोला लेकर आई। उसे स्वादिष्ट सीपी मिल सके इसके लिए, उसने पकाने से पहले सीपी की जाँच करने का फैसला किया ताकि वो देख सके कि सीपियाँ अच्छी हैं या नहीं और बुरी सीपियों को अलग निकाल सके। इसलिए, उसने एक सीपी निकाली, यह सोचकर कि वो ताज़ा और जीवित है, उसने उसे अन्य सीपियों के आकलन के लिए मानक के रूप में इस्तेमाल किया। फिर वो उनकी खोल पर हल्के से मारता, और उनकी तुलना मानक के साथ करता था। उसने एक-एक करके उन सीपियों को जांचा। सारी जाँच होने के बाद, उसने पाया कि अन्य सभी सीपियाँ या तो खराब थीं या मृत थीं। उसने अपनी मां को इस बारे में बताया। उसकी मां ने सोचा कि यह असंभव है, इसलिए, वह देखने गई कि क्या हुआ है। तब जाकर उसकी माँ को पता चला कि ऐसा इसलिए नहीं है कि अन्य सीपियाँ ताज़ा नहीं थीं, बल्कि उसके बेटे ने जिस सीपी को मानक के रूप में इस्तेमाल किया था, वास्तव में वह खराब थी। इस तरह, उसका बेटा यह कैसे बता सकता था कि अन्य सीपियाँ अच्छी हैं या नहीं, जब उसने एक खराब सीपी को मानक के रूप में खराब इस्तेमाल किया था?

कहानी पढ़ते समय, मैं नायक के लिए चिंतित था क्योंकि मुझे लगा था कि उसकी माँ को विक्रेता ने धोखा दे दिया है, और उस लड़के को सीपियाँ खाने के लिए नहीं मिलेंगी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि वास्तव में पहली सीपी खराब थी। उस लड़के ने सोचा कि अपनी कल्पना पर निर्भर रहना अच्छा है, और उसने इसे मानक के रूप में उपयोग किया, जिसका नतीजा ये हुआ कि सभी सीपियों को उसने खराब मान लिया। अगर उसकी माँ को समय पर उसकी गलती का पता नहीं चलता, तो मुझे लगता है, उसने सभी क्लैसीपियों को फेंक दिया होता। कल्पनाएं और अवधारणाएं वास्तव में लोगों के लिए हानिकारक हैं!

उस समय मैं व्यवस्था के युग के बारे में सोचे बिना ना रह सका। उस समय, यहूदी मुख्य याजक, शास्त्री और फरीसी उत्सुकता से मसीहा के आगमन के लिए तरस रहे थे, लेकिन साथ ही, उन्होंने मसीह का विरोध करने और उनकी निंदा करने की पूरी कोशिश की। उन्होंने भविष्यवाणियों के बारे में बहुत सारे भ्रमों को पाल रखा था। वे सोचते थे कि उद्धारकर्ता जब आये तब उसको मसीहा कहा जाना चाहिए, वह शाही महल में या एक महान परिवार में या कम से कम एक प्रतिष्ठित परिवार में पैदा होना चाहिए। फिर भी जब प्रभु यीशु आए, तो उन्हें मसीहा नहीं कहा जाता था और उनका जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ था, जो पूरी तरह से उन लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के विपरीत था। इसलिए वे ईश निंदा करने लगे और प्रभु यीशु का तिरस्कार करने लगे। प्रभु यीशु का विरोध करने और उनका अपमान करने के लिए वे अपने गलत दृष्टिकोण पर अड़े रहे कि “जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता है, तब तक तुम मसीह नहीं हो”। उनके पास ऐसा हृदय नहीं है जो सत्य की तलाश करे। अंत में, न केवल वे मसीहा का स्वागत करने में विफल रहे, बल्कि उन्होंने प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। उन्होंने एक भयानक पाप किया और पूरे राष्ट्र को विनाश के अधीन कर दिया गया।

प्रभु यीशु मसीह लोगों के साथ संगति करता है

लेकिन सामरी स्त्री अलग थी। प्रभु यीशु की उसके साथ बातचीत के बाद, वह जान गयी कि प्रभु यीशु आने वाले मसीहा थे। इसलिए उसने प्रभु यीशु का अनुसरण किया। जब प्रभु ने पतरस, यूहन्ना, मत्ती, मरकुस और अन्य लोगों को बुलाया, तब भले ही वे यह नहीं जानते थे कि प्रभु यीशु मसीहा थे, लेकिन चूँकि उन्हें यीशु के उपदेशों में सत्य मिला, इसलिए दूसरों की बातें सुनने और अपनी आँखों देखे हाल के आधार पर प्रभु की आलोचना करने के बजाय, वे प्रभु का पालन करने और अनुसरण करने में सक्षम हुए। इसी प्रकार नतनएल भी तुरंत आश्वस्त हो गया था, उसने मान लिया कि प्रभु यीशु ही आने वाले मसीहा थे और जब उसने प्रभु यीशु को उसके हृदय के विचारों को कहते सुना तो उसने उनका अनुसरण किया। साथ ही, बहुत से लोगों ने प्रभु यीशु के उपदेश और उनके द्वारा व्यक्त किये गये सत्य जैसे कि ये पद:”मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है” (मत्ती 4:17), “तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख। ये ही दो आज्ञाएँ सारी व्यवस्था और भविष्यद्वक्‍ताओं का आधार हैं” (मत्ती 22:37-40), आदि को सुनने के बाद और प्रभु यीशु के कर्मों: पाँच हज़ार लोगों को और दो मछलियों और पाँच रोटियों से खिलाना, हवा और समुद्र को शांत करना, एक वचन से मृत को पुनर्जीवित करना, आदि को देखने के बाद प्रभु यीशु का अनुसरण किया। ऊपर से, हम देख सकते हैं कि ये लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर भरोसा नहीं करते थे, और फरीसियों से बंधे नहीं थे। इसके बजाय, प्रभु की कथनी और करनी के माध्यम से, उन्होंने यह पहचाना कि प्रभु यीशु आने वाले मसीहा थे और इस प्रकार उनका अनुसरण किया। इस प्रकार उनकी नियति अन्य यहूदियों से काफी अलग होने कारण उन्होंने प्रभु का स्वागत किया।

यशायाह 55:8-9 में कहा गया है: “क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं हैं, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है।” यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के कार्य की थाह नहीं पा सकता है। परमेश्वर बुद्धिमान और सर्वशक्तिमान हैं। वह हमारी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार अपना कार्य नहीं करते हैं। ठीक उसी तरह जब प्रभु यीशु आए थे, सभी लोगों ने सोचा था कि परमेश्वर का नाम मसीहा होना चाहिए, और वह महल में पैदा होना चाहिए। लेकिन, परमेश्वर के कार्य ने मनुष्य की अवधारणाओं पर बड़ा प्रहार किया। प्रभु यीशु को मसीहा नहीं कहा जाता था, और वह एक गौशाले में पैदा हुए थे। इसलिए हम अपने मन की कल्पनाओं के अनुसार परमेश्वर के कार्य का चित्रण नहीं कर सकते। ईसाई होने के नाते, हम परमेश्वर के शीघ्र लौटने की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं। यहूदियों की गलती को दोहराने से बचने के लिए हमें प्रभु का स्वागत किस तरह क्या करना चाहिए?

बीते वर्षों की याद करूं तो मैं सोचता रहा हूँ कि प्रभु बड़े धूम-धाम के साथ एक सफेद बादल पर सवार होकर लौटेंगे—स्वर्गदूतों की तुरहियाँ बजेंगी, और मृतक फिर जीवित हो जायेंगे। इसलिए इन वर्षों में, मैं अक्सर आकाश में बादलों को देखता और इंतजार करता था कि प्रभु एक सफेद बादल पर हमें स्वर्गिक घर ले जाने के लिए वापस लाएं। हालाँकि मेरे आस-पास के कुछ लोगों ने मुझे इस बात की गवाही दी है कि प्रभु यीशु ने वापस लौटकर वचनों को व्यक्त किया है, और परमेश्वर के भवन से शुरू होने वाले न्याय का कार्य किया है, फिर भी मैं खोज और जांच करने के लिए तैयार नहीं हूँ। नतीजतन, मैं उस दिन के लिए तरस रहा हूँ और इंतजार कर रहा हूँ जब वह एक सफेद बादल पर लौटेंगे। फिर भी, इतने वर्षों के बाद, न तो प्रभु आये हैं, न उन्होंने हमें उनसे मिलने के लिए हवा में उठाया है। अब जब मैं इस बारे में सोचता हूँ, तो क्या मैंने अपनी धारणाओं में परमेश्वर को इस तरह परिभाषित नहीं किया है कि कोई भी प्रभु यीशु जो सफेद बादल पर सवार होकर नहीं आते हैं वह एक झूठे मसीह हैं? इस तरह से प्रभु की वापसी की प्रतीक्षा करते हुए, क्या मैं अभी भी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में नहीं जी रहा हूँ?

जब मैं बाइबल पढ़ता हूँ, तो मैं प्रकाशितवाक्य में यह लिखा पाता हूँ: “जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है। जो जय पाए, मैं उसे उस जीवन के पेड़ में से जो परमेश्‍वर के स्वर्गलोक में है, फल खाने को दूँगा” (प्रकाशितवाक्य 2:7), “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ” (प्रकाशितवाक्य 3:20)। इन पदों से हम देख सकते हैं कि प्रभु की वापसी का स्वागत करने की कुंजी यह है कि हमें परमेश्वर की वाणी सुनने पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें उनके वचनों और उनके कार्य के माध्यम से जानने की कोशिश करनी चाहिए, जैसे कि बुद्धिमान कुंवारियाँ, जो दूल्हे की आवाज़ सुनकर उसका अभिवादन करने गयी थीं। क्या सामरी स्त्री ने प्रभु यीशु को उनके कथन से मसीहा के रूप में नहीं पहचाना था? इसके अलावा, यह उनकी कथनी और करनी के माध्यम से ही है कि प्रभु यीशु का अनुसरण करने वाले शिष्यों, जैसे कि पतरस, यूहन्ना, मत्ती और फिलिप्पुस, ने पाया कि प्रभु यीशु ही वो हैं जिनके पास अधिकार और शक्ति है, और इस प्रकार उन लोगों ने उनका अनुसरण किया। उन्होंने अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर भरोसा करते हुए प्रभु को परिभाषित नहीं किया, बल्कि परमेश्वर की वाणी को सुनने का चुनाव किया, और अंत में, उन्होंने प्रभु यीशु के उद्धार को प्राप्त किया! इससे पता चलता है कि प्रभु की वापसी का स्वागत करने में परमेश्‍वर की वाणी सुनने पर ध्यान देना हमारे लिए बहुत महत्व रखता है!

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समझदार कुँवारियों को प्रभु यीशु मसीह का स्वागत कैसे करना चाहिए?

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यीशु मसीह का दूसरा आगमन:समझदार कुँवारियों को प्रभु यीशु मसीह का स्वागत कैसे करना चाहिए?

समझदार कुँवारियों का दृष्टान्त

प्रभु यीशु ने कहा, “तब स्वर्ग का राज्य उन दस कुँवारियों के समान होगा जो अपनी मशालें लेकर दूल्हे से भेंट करने को निकलीं। उनमें पाँच मूर्ख और पाँच समझदार थीं। मूर्खों ने अपनी मशालें तो लीं, परन्तु अपने साथ तेल नहीं लिया। परन्तु समझदारों ने अपनी मशालों के साथ अपनी कुप्पियों में तेल भी भर लिया। जब दुल्हे के आने में देर हुई, तो वे सब उँघने लगीं, और सो गई। ‘आधी रात को धूम मची, कि देखो, दूल्हा आ रहा है, उससे भेंट करने के लिये चलो। तब वे सब कुँवारियाँ उठकर अपनी मशालें ठीक करने लगीं। और मूर्खों ने समझदारों से कहा, ‘अपने तेल में से कुछ हमें भी दो, क्योंकि हमारी मशालें बुझ रही हैं।’ परन्तु समझदारों ने उत्तर दिया कि कही हमारे और तुम्हारे लिये पूरा न हो; भला तो यह है, कि तुम बेचनेवालों के पास जाकर अपने लिये मोल ले लो। जब वे मोल लेने को जा रही थीं, तो दूल्हा आ पहुँचा, और जो तैयार थीं, वे उसके साथ विवाह के घर में चलीं गई और द्वार बन्द किया गया। इसके बाद वे दूसरी कुँवारियाँ भी आकर कहने लगीं, ‘हे स्वामी, हे स्वामी, हमारे लिये द्वार खोल दे।’ उसने उत्तर दिया, कि मैं तुम से सच कहता हूँ, मैं तुम्हें नहीं जानता’” (मत्ती 25:1-12)।

क्या बाइबल पढना, अक्सर प्रार्थना करना, मेहनत करना और सतर्कता से प्रभु के आगमन का इंतज़ार करना एक व्यक्ति को समझदार कुँवारी बनाता है?

ईमानदारी से प्रभु पर विश्वास करने वाले प्रत्येक भाई-बहन, एक समझदार कुँवारी होने की उम्मीद करते हैं जो अंत के दिनों में, हमारे उद्धारकर्ता, प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत कर सकेंगे और उनके साथ भोज में शामिल हो सकेंगे। इसके लिए, कुछ लोग अक्सर बाइबल पढ़ते हैं, प्रार्थना करते हैं, सतर्क और तैयार रहते हैं, कुछ लोग कड़ी मेहनत करते हैं, दान करते हैं, स्वयं को खपाते हैं, कुछ लोग समय पर सभाओं में भाग लेते हैं और प्रभु के आगमन की चौकस होकर प्रतीक्षा करते हैं। हम में से हर एक खुद को तैयार करता है, खुद को खपाता है और अपने तरीके से इंतज़ार करता है। हम दृढ़ता से मानते हैं कि हम समझदार कुंवारियाँ हैं और हम निश्चित रूप से प्रभु की वापसी का स्वागत करने में सक्षम होंगे। और फिर भी, आजकल, दुनिया भर में अकाल, महामारियों और भूकंपों की अधिक से अधिक घटनाएं हो रही हैं, हर समय युद्ध हो रहे हैं और अक्सर कौतुक उत्पन्न करने वाले रक्तिम चंद्रमा प्रकट हो रहे हैं; प्रभु की वापसी के सभी शकुन मूल रूप से पूर्ण हो चुके हैं और, जैसा कि उम्मीद की जानी चाहिए, प्रभु को वापस लौटना चाहिए। हम इतने सालों तक सतर्क और तैयार रहे हैं, तो ऐसा कैसे है कि हमने अब तक प्रभु का स्वागत नहीं किया है? कुछ भाई-बहन चिंता किये बिना नहीं रह पाते: “क्या इस तरह से हमारा तेल तैयार करना प्रभु की इच्छा के विपरीत है? वास्तव में समझदार कुँवारियाँ कौन हैं? और मूर्ख कुँवारियाँ कौन हैं? समझदार कुँवारियों को परमेश्वर का स्वागत कैसे करना चाहिए और मेम्ने के विवाह-भोज में शामिल होने के लिए तेल कैसे तैयार करना चाहिए?”

समझदार कुँवारियाँ कौन हैं?

इन प्रश्नों के संबंध में, हम उत्तर उन लोगों पर नज़र डाल कर पा सकते हैं जिन्होंने प्रभु यीशु को उस मसीहा के रूप में स्वीकार किया जिसकी भविष्यद्वाणी की गयी थी और उन लोगों पर जिन्होंने प्रभु यीशु के उद्धार को दो हजार साल पहले खो दिया था, जब प्रभु यीशु अपना कार्य करने के लिए दुनिया में आए थे। व्यवस्था के युग के अंत में, अधिक से अधिक लोगों को व्यवस्था द्वारा मृत्यु दंड दिए जाने का खतरा था क्योंकि वे व्यवस्था बनाये रखने में असमर्थ थे। मनुष्य को व्यवस्था द्वारा दोषी ठहराए जाने और शापित होने से बचाने के लिए, परमेश्वर ने प्रभु यीशु के रूप में देहधारण किया और छुटकारे का कार्य किया, उन्होंने मनुष्य को, “मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है” (मत्ती 4:17) का पथ दिया और उन्होंने कई चमत्कार किए, जैसे हवाओं और समुद्र को शांत करना, पाँच रोटियाँ, दो मछलियों से पाँच हज़ार लोगों को खिलाना और एक वचन से मृत लोगों को वापस लाना। जो सच में सत्य की तलाश करते और जो परमेश्वर के प्रकट होने के लिए तरसते थे, जैसे कि पतरस, यूहन्ना और मत्ती, उन्होंने प्रभु यीशु के कार्य और वचनों में परमेश्वर के अधिकार और शक्ति को पहचाना। इसलिए उन्होंने प्रभु को उस मसीहा के रूप में पहचाना जिसकी आने की भविष्यवाणी की गई थी, और इसलिए उन्होंने प्रभु का अनुसरण किया और उनका उद्धार प्राप्त किया। इसके अलावा, सामरी स्त्री ने प्रभु को उसके दिल में दफन राज़ को उजागर करते हुए सुना। उसने महसूस किया कि केवल परमेश्वर ही व्यक्ति के सभी गहरे रहस्यों को प्रकाश में ला सकते हैं, और इस प्रकार उसने पहचाना कि प्रभु यीशु मसीहा हैं, मसीह हैं। इन लोगों ने प्रभु यीशु के वचनों में परमेश्वर की वाणी सुनी, और उन्होंने प्रभु यीशु को स्वयं परमेश्वर के रूप में पहचाना—वे समझदार कुँवारियाँ थे, और वे वही थे जिन्होंने दूल्हे का स्वागत किया और उनके साथ भोज में भाग लिया। जहाँ तक मुख्य याजकों, शास्त्रियों और फरीसियों की बात है, तो भले ही वे बाइबल के अच्छे जानकार थे, भले ही उन्होंने दूर-दूर तक सुसमाचार का प्रचार किया था, बहुत दुख झेले और बड़ी कीमत अदा की थी, लेकिन वे अभिमानी, अहंकारी थे और वे अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से यह मानते हुए चिपके रहते थे कि कोई व्यक्ति जिसे मसीहा नहीं कहा जाता है, संभवतः वह परमेश्वर नहीं हो सकता है। प्रभु यीशु द्वारा कहे गए वचनों में अधिकार और शक्ति थी, फिर भी न केवल फरीसियों ने उनके वचनों के भीतर सत्य की तलाश नहीं की, बल्कि उन्होंने प्रभु यीशु के वचनों में दोष खोजने की कोशिश की, उन्होंने आलोचना की, ईशनिंदा की, यहूदी आस्थावानों को धोखा दिया, उन्हें बाधित किया कि वे प्रभु का अनुसरण न करें। यहाँ तक कि प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाने के लिए रोमन अधिकारियों से सांठ-गाँठ करने की हद तक भी चले गये। इस प्रकार, वे ऐसे लोग बन गए जो परमेश्वर में विश्वास तो करते थे, फिर भी उनका विरोध करते थे, उन्होंने परमेश्वर के स्वभाव का अपमान किया और वे परमेश्वर के क्रोध और दंड के अधीन हो गए।

इससे, हम देख सकते हैं कि समझदार कुँवारियाँ इसलिए समझदार थीं क्योंकि उन्होंने परमेश्वर वाणी को सुनने पर ध्यान रखा था, एक बार जब वे परमेश्वर की वाणी को समझने में सक्षम हो गये, तो वे सत्य को स्वीकार करने और परमेश्वर के प्रकटन का स्वागत करने में सक्षम हो गये। मूर्ख कुँवारियाँ इसके बिल्कुल विपरीत थीं। उन्होंने परमेश्वर की वाणी को नहीं पहचाना, इसलिए भले ही उन्होंने सत्य कथनों को सुना, फिर भी वे तलाश करने के लिए आगे नहीं बढ़े, उन्होंने उन्हें स्वीकार नहीं किया, और वे उनके अधीन नहीं हुये। वे बस अपनी ही धारणाओं और कल्पनाओं पर अड़े रहे और उन्होंने परमेश्वर के प्रकटन और कार्य को अस्वीकार कर दिया, और इस प्रकार, अंततः, उन्होंने परमेश्वर के उद्धार को खो दिया। यह पर्याप्त रूप से साबित करता है कि एक व्यक्ति परमेश्वर में कितने समय से विश्वास करता है, उसे बाइबल का कितना ज्ञान है, कोई कितना काम और मेहनत करते हुए प्रतीत होता है या कितनी पीड़ा सहता है और खुद को खपाता है, इन बातों की आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि कोई व्यक्ति समझदार कुँवारी बन सकता या नहीं, इसके बजाय यह इस आधार पर कहा जा सकता है कि क्या कोई परमेश्वर की वाणी को सुनने का ध्यान रखता है और क्या उसे समझ सकता है। जैसा कि प्रभु यीशु ने कहा है: “मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे-पीछे चलती हैं” (यूहन्ना 10:27)। अगर हम अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के भीतर रहते हैं और हम मानते हैं कि हमें बस बाइबल पढ़ना, प्रार्थना करना, सतर्क व् तैयार रहना, सभाओं में जाना, चौकस रहना, प्रभु के लिए कड़ी मेहनत करना, दान करना और खुद को खपाना है, लेकिन हम परमेश्वर की वाणी को सुनने पर ध्यान न दें और सत्य कथन को सुनकर भी उनकी तलाश या जाँच न करें, तो हम मूर्ख कुंवारियां बनने के लिए उपयुक्त होंगे और हम प्रभु द्वारा त्याग दिए जाएंगे!

अंत के दिनों में प्रभु की वापसी को लेकर समझदार कुँवारियों का क्या दृष्टिकोण होना चाहिए?

हम अब प्रभु यीशु की वापसी के महत्वपूर्ण समय में हैं। प्रभु यीशु ने कहा है, “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)। “आधी रात को धूम मची, कि देखो, दूल्हा आ रहा है, उससे भेंट करने के लिये चलो” (मत्ती 25:6)। “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा, और वह मेरे साथ” (प्रकाशितवाक्य 3:20)। “मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे-पीछे चलती हैं” (यूहन्ना 10:27)। और प्रकाशितवाक्य के अध्याय 2 और 3 में कई बार भविष्यवाणी की गयी है “जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है।” इससे, हम देख सकते हैं कि, जब प्रभु यीशु अंत के दिनों में वापस आएंगे, तो उनके पास अभी भी कलीसियाओं से कहने के लिए चीजें हैं और वे सरे सत्य को समझने और उसमें प्रवेश करने के लिए हमारी अगुआई करेंगे। दूसरे तरीके से कहें तो, जब प्रभु यीशु वापस आएंगे, तो वह अपनी भेड़ों की तलाश करने के लिए अपने कथनों का उपयोग करेंगे। समझदार कुंवारियाँ हृदय और आत्मा दोनों से युक्त होती हैं, और जब वे किसी को प्रभु यीशु की वापसी की खबर की गवाही देते हुए सुनती हैं, तो वे सकारात्मक और सक्रिय रूप से खोज करने और परमेश्वर की वाणी सुनने में सक्षम होती हैं। खोज और जाँच के दौरान, समझदार कुंवारियाँ प्रभु की वाणी को पहचानने में सक्षम होती हैं और इस तरह, वे अपने दिल के द्वार खोलने, प्रभु का स्वागत करने और प्रभु के साथ भोज में शामिल होने में सक्षम होती हैं।

परमेश्वर की वाणी को कैसे पहचानें

जब हम प्रभु की वापसी का समाचार सुनते हैं, तो, हम प्रभु की वाणी को कैसे पहचान सकते हैं? परमेश्वर की वाणी को पहचानने के कौन से सिद्धांत हैं और किन महत्वपूर्ण बिंदुओं को हमें समझना चाहिए?

1. परमेश्वर के वचन उनके स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ हैं और उनमें सामर्थ्य और अधिकार दोनों होता है

जैसा कि हम सभी जानते हैं, शुरुआत में, परमेश्वर ने दुनिया और सभी चीजों को बनाने के लिए वचनों का इस्तेमाल किया था। उनके एक वचन कहते ही वो पूरा हो जाता है। परमेश्वर बोलते हैं और वो हो जाता है, वह आज्ञा देते हैं और वह डट कर खड़ा होता है—यह परमेश्वर के वचनों का सबसे स्पष्ट लक्षण है। पुराने नियम के समय में, परमेश्वर ने वादा किया था कि अब्राहम के वंशज आकाश में तारे के समान या रेत के दाने के समान होंगे, और वैसा ही हुआ। परमेश्वर जो कुछ कहते हैं वह पूरा होगा, यह उनके वचनों का अधिकार और सामर्थ्य है। यहोवा परमेश्‍वर ने कहा, “जो मुझसे बैर रखते हैं उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को पितरों का दण्ड दिया करता हूँ, और जो मुझसे प्रेम रखते और मेरी आज्ञाओं को मानते हैं उन हजारों पर करुणा किया करता हूँ” (व्यवस्थाविवरण 5:9-10)। प्रभु यीशु ने कहा: “मैं तुम से सच कहता हूँ, यदि तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाओगे” (मत्ती 18:3)। “इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, पर पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न ही आनेवाले में क्षमा किया जाएगा” (मत्ती 12:31-32)। “परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ, कि जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा, वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा और जो कोई अपने भाई को निकम्मा कहेगा वह महासभा में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई कहे ‘अरे मूर्ख’ वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा” (मत्ती 5:22)। परमेश्वर के वचन अधिकार और सामर्थ्य वहन करते हैं, वे परमेश्वर के स्वभाव को वहन करते हैं। परमेश्वर के वचनों से, हम न केवल यह देख सकते हैं कि उनके वचन सभी चीजों पर शासन और प्रशासन करते हैं, बल्कि हम यह भी देख सकते हैं कि उनके वचन लोगों से वादे करते हैं और आशीष देते हैं, वे मनुष्य के विद्रोह और अवज्ञा को शाप भी दे सकते हैं। जो लोग परमेश्वर को प्यार करते हैं, उनके प्रति वो दया और प्रेम से भरे होते हैं, और जो लोग उनकी अवहेलना करते हैं, उनके लिए वे प्रताप और क्रोध से भर जाते हैं, इस प्रकार हमें अपना धर्मी स्वभाव देखने देते हैं जो कोई अपमान नहीं सहता है। इससे, हम देख सकते हैं कि परमेश्वर के सभी वचन उसके स्वभाव और स्वरूप की अभिव्यक्तियाँ हैं, इससे भी अधिक, वे सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार और सामर्थ्य को धारण करते हैं। कोई भी इंसान परमेश्वर के वचनों को नहीं बोल सकता है, और अगर हम परमेश्वर के वचनों के इस लक्षण को समझ सकते हैं, तो हम परमेश्वर की वाणी को सही ढंग से पहचान पाएंगे।

2. परमेश्वर के वचन उनके प्रबंधन कार्य के रहस्य को उजागर कर सकते हैं

परमेश्वर के कथन अनिवार्य रूप से उनके प्रबंधन कार्य के रहस्यों को प्रकट करने में सक्षम होंगे। उदाहरण के लिए, पुराने नियम में भविष्यवाणी की गई थी कि एलिय्याह आएगा, लेकिन जब वह आया तो किसी ने भी उसे नहीं पहचाना। केवल जब प्रभु यीशु ने यह कहते हुए, “और चाहो तो मानो, एलिय्याह जो आनेवाला था, वह यही है” (मत्ती 11:14), रहस्य का खुलासा किया तभी लोगों ने पहचाना कि यूहन्ना बप्तिस्ता ही नबी एलिय्याह है। इसके अलावा प्रभु यीशु ने कहा: “मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है” (मत्ती 4:17)। “फिर स्वर्ग का राज्य उस बड़े जाल के समान है, जो समुद्र में डाला गया, और हर प्रकार की मछलियों को समेट लाया। और जब जाल भर गया, तो मछुए किनारे पर खींच लाए, और बैठकर अच्छी-अच्छी तो बरतनों में इकट्ठा किया और बेकार-बेकार फेंक दी। जगत के अन्त में ऐसा ही होगा; स्वर्गदूत आकर दुष्टों को धर्मियों से अलग करेंगे, और उन्हें आग के कुण्ड में डालेंगे। वहाँ रोना और दाँत पीसना होगा” (मत्ती 13:47-50)। “जो मुझसे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है” (मत्ती 7:21) केवल जब प्रभु यीशु ने स्वर्ग के राज्य के रहस्यों का अनावरण किया, तभी हमें समझ में आया कि केवल वे जो वास्तव में पश्चाताप करते हैं और जो स्वर्ग के पिता की इच्छा पूरी करते हैं, वे स्वर्गीय राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। दूसरी ओर जो दुष्ट वास्तव में पश्चाताप नहीं करते हैं, वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने में असमर्थ होंगे। इसके अलावा, प्रभु यीशु ने यह भी भविष्यवाणी की थी कि वह वापस आएंगे, और मनुष्य का पुत्र अंत के दिनों में न्याय का कार्य करेगा और आपदाओं के आने से पहले लोगों के एक समूह को विजेता में परिपूर्ण करेगा। उन्होंने मसीह के राज्य के प्रकट होने जैसी बातों की भविष्यवाणी भी की थी। प्रभु यीशु हमें इन रहस्यों के बारे में बताने में सक्षम क्यों थे? ऐसा इसलिए था क्योंकि प्रभु यीशु स्वयं परमेश्वर थे, और केवल परमेश्वर ही जानते हैं कि स्वर्ग का राज्य किस प्रकार के लोगों को चाहता है, अंत के दिनों में परमेश्वर किस कार्य को करेंगे, और वह अंततः मानवजाति के उद्धार से क्या हासिल करेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि, केवल परमेश्वर के कथनों से परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के रहस्यों को प्रकट किया जा सकता है और कोई भी मनुष्य उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता है। यह परमेश्वर की वाणी का लक्षण है।

3. परमेश्वर के वचन ही वो सत्य हैं जो हमारी असल समस्याओं का समाधान कर सकते हैं और हमें अभ्यास का पथ दिखा सकते हैं

प्रभु यीशु ने कहा “मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ” (यूहन्ना 14:6)। प्रत्येक वचन जो परमेश्वर बोलते हैं वो सत्य है और परमेश्वर जीवंत जल का झरना हैं जो सत्य को व्यक्त करता है, भ्रष्ट मानवजाति के तौर पर हमारी आवश्यकताओं के अनुसार हमें सत्य के एक स्थिर प्रवाह की आपूर्ति देते हैं और हमें आगे बढ़ने देते हैं। उदाहरण के लिए, व्यवस्था के युग के अंत में, लोग व्यवस्था या आज्ञाओं को बनाये नहीं रख पा रहे थे, और सभी पर व्यवस्था द्वारा दोषी ठहराए जाने और मौत के घाट उतारे जाने का खतरा मंडरा रहा था। परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से प्रभु यीशु के रूप में देहधारण कर प्रकट हुए और अपना कार्य किया। पुराने नियम के व्यवस्था की नींव पर, उन्होंने पश्चाताप का मार्ग व्यक्त किया और अपने अनुयायियों को अभ्यास का विशिष्ट पथ दिखाया जिसकी उन्हें ज़रूरत थी। उदाहरण के लिए प्रार्थना के संबंध में, प्रभु यीशु ने कहा: “परमेश्‍वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसकी आराधना करनेवाले आत्मा और सच्चाई से आराधना करें” (यूहन्ना 4:24)। “प्रार्थना करते समय अन्यजातियों के समान बक-बक न करो; क्योंकि वे समझते हैं कि उनके बार-बार बोलने से उनकी सुनी जाएगी” (मत्ती 6:7)। एक दूसरे के साथ सामंजस्य बिठाने के विषय में प्रभु यीशु ने कहा, “क्योंकि यदि तुम अपने प्रेम रखनेवालों ही से प्रेम रखो, तो तुम्हारे लिये क्या लाभ होगा? क्या चुंगी लेनेवाले भी ऐसा ही नहीं करते? और यदि तुम केवल अपने भाइयों को ही नमस्कार करो, तो कौन सा बड़ा काम करते हो? क्या अन्यजाति भी ऐसा नहीं करते? इसलिए चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है” (मत्ती 5:46-48)। “दोष मत लगाओ, कि तुम पर भी दोष न लगाया जाए। क्योंकि जिस प्रकार तुम दोष लगाते हो, उसी प्रकार तुम पर भी दोष लगाया जाएगा; और जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा” (मत्ती 7:1-2)। प्रभु यीशु द्वारा कहे गए वचनों से, हमने एक नया मार्ग प्राप्त किया जो व्यवस्था से ऊपर था और हमारी सभी वास्तविक समस्याओं और कठिनाइयों का समाधान हो गया। साथ ही, हमें अभ्यास का एक अधिक सटीक मार्ग भी मिला, और जब हम प्रभु की शिक्षाओं के अनुसार अभ्यास करते हैं, तब हम पवित्र आत्मा के कार्य और मार्गदर्शन का आनंद लेने में सक्षम होते हैं, और परमेश्वर के साथ हमारा संबंध निकटता का हो जाता है। इसलिए यह स्पष्ट है कि प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त किए गए ये वचन वे थे जिनकी लोगों को अनुग्रह के युग में आवश्यकता थी और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वे हमारे जीवन की आपूर्ति बन गए। तो परमेश्वर ने हमारी अगुआई करने के लिए अंत के दिनों में कौन से वचन व्यक्त करेंगे? इस प्रश्न को समझने के लिए, एक तथ्य है जिससे हमें सबसे पहले अवगत होना होगा: प्रभु यीशु ने छुटकारे का कार्य किया। भले ही हमें प्रभु में हमारे विश्वास के कारण क्षमा कर दिया गया है, लेकिन हमारी पापी प्रकृति अभी भी अनसुलझी है, इसलिए हम अभी भी बार-बार पाप करने में सक्षम हैं और परमेश्वर की शिक्षाओं को व्यवहार में लाने में असमर्थ है। प्रभु पवित्र है, और जब तक हमारी पापी प्रकृति को दूर नहीं किया जाता है, तब तक हमारे पास प्रभु की प्रशंसा प्राप्त करने का कोई तरीका नहीं है। यही कारण है कि प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की थी कि वे अंत के दिनों में अपने वचनों को बोलने और मनुष्य को शुद्ध करने और बचाने के लिए कार्य करने आयेंगे। प्रभु यीशु ने कहा, “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)। “यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता, क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है* और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैंने कहा है, वह अन्तिम दिन में उसे दोषी ठहराएगा” (यूहन्ना 12:47-48)। इब्रानियों के अध्याय 9:28 में लिखा है, “वैसे ही मसीह भी बहुतों के पापों को उठा लेने के लिये एक बार बलिदान हुआ और जो लोग उसकी प्रतीक्षा करते हैं, उनके उद्धार के लिये दूसरी बार बिना पाप के दिखाई देगा।” हम इससे देख सकते हैं कि, अंत के दिनों में, परमेश्वर सत्य का उपयोग न्याय करने, शुद्ध करने और हमें पापों के बंधन से बचाने के लिए करेंगे। दूल्हे की आवाज़ सुनने के लिए जो समझदार कुंवारीयां उत्सुकता से इंतजार कर रहे हैं, उन्हें कुछ हद तक प्रेरित होना चाहिए। यदि वे किसी को यह उपदेश देते हुए सुनते हैं कि प्रभु अपने न्याय का कार्य करने के लिए लौट आए हैं, तो, उन्हें बहुत ध्यान से सुनना चाहिए। जब तक वचन उनके भ्रष्टाचार को उजागर कर सकते हैं, उन्हें पाप से मुक्त होने का रास्ता दिखा सकते हैं और उन्हें जीवन प्रदान कर सकते हैं, तब तक ये वचन वास्तव में परमेश्वर की वाणी होंगे।

4. परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच करते हैं और वे मानवजाति की भ्रष्टता को अच्छे से समझ सकते और उसे उजागर कर सकते हैं

परमेश्वर सृष्टिकर्ता हैं और उनका आत्मा सभी चीजों की जाँच करता है। परमेश्वर हमें अपनी हथेली की तरह जानते हैं, और केवल परमेश्वर के वचन हमारे भ्रष्टाचार के स्रोत और हमारे स्वभाव के सार को उजागर कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर थे, जिसका अर्थ है कि वे स्वर्ग में परमेश्वर का आत्मा थे जो एक साधारण देह के रूप में साकार हुए थे। इसलिए, प्रभु यीशु द्वारा कहे गए वचन हमारे मानवीय सार को तुरंत उजागर करने में सक्षम थे। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि उस समय के फरीसी, आम यहूदी लोगों की आंखों में पवित्रता के साथ परमेश्वर की सेवा करते थे। लेकिन प्रभु यीशु ने मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच की, और उन्होंने फरीसियों की प्रकृति के सार को देखा, जो अधर्म से प्रेम व सत्य से घृणा करता था, और उन्होंने फरीसियों को यह कहकर उजागर किया: “हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं” (मत्ती 23:27)। “हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के विरोध में स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो आप ही उसमें प्रवेश करते हो और न उसमें प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो” (मत्ती 23:13)। “हे साँपो, हे करैतों के बच्चों, तुम नरक के दण्ड से कैसे बचोगे?” (मत्ती 23:33)। परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच करते हैं और उस पाप को देख सकते हैं जो हमारे हृदयों के भीतर है। वह फरीसियों की उस प्रकृति को जानते थे, जो सत्य से घृणा करता था और जो उनसे घृणा करता था, वह जानते थे कि वे मसीह विरोधी हैं जिन्होंने स्वयं को उनके विरुद्ध खड़ा किया है। इसलिए प्रभु यीशु ने फरीसियों के दुष्ट कामों को उजागर किया और उनके पापों के लिए उनकी निंदा की। इसलिए हम देख सकते हैं कि परमेश्वर सत्य है और परमेश्वर का वचन प्रकाश है, और सारे अंधेरे और बुराई उनके वचनों से प्रकट होनी ही चाहिए! अंत के दिनों में, परमेश्वर हमारी सभी अधार्मिकताओं का न्याय करने के लिए सत्य को व्यक्त करते हैं और उन्हें हमारे सभी शैतानी भ्रष्टतापूर्ण स्वभावों को उजागर करना होगा, जिनसे हम अनभिज्ञ हैं, ताकि हमें अपने स्वयं के भ्रष्टाचार का पता चल सके। केवल समझदार कुंवारियों की तरह होने और परमेश्वर का आदर करने और सत्य को स्वीकार करने वाला हृदय पा कर ही हम अंत के दिनों में परमेश्वर का उद्धार प्राप्त कर पाएंगे।

ऊपर वे मुख्य सिद्धांत और मार्ग हैं जिनसे हम परमेश्वर की वाणी को समझ सकते हैं। इन सिद्धांतों को समझने-बूझने के द्वारा, जब हम किसी को यह गवाही देते हुए सुनते हैं कि प्रभु लौट आए हैं और हमारे तक उन कथनों को लाए हैं जो पवित्र आत्मा कलीसियाओं को बोलता है, जब हम सकारात्मक और सक्रिय रूप से इसकी खोज करते हैं और अपने दिल से इन वचनों को सुनते हैं, तब हम परमेश्वर की वाणी को सही ढंग से पहचान सकेंगे और प्रभु की वापसी का स्वागत कर सकेंगे। इसलिए, यदि हम समझदार कुंवारी बनने की इच्छा रखते हैं, तो हमें अपनी अवधारणाओं और कल्पनाओं को त्यागना चाहिए, परमेश्वर की वाणी को सुनने पर ध्यान देना चाहिए, परमेश्वर के कथन के लक्षणों के अनुसार परमेश्वर की वाणी को पहचानना चाहिए, और फिर उसे स्वीकार करना, उसके अधीन होना और उसका पालन करना चाहिए और मेम्ने के नक्शेकदम का करीबी से अनुसरण करना चाहिए। केवल ऐसा करने से ही हम जीवन के जीवित जल की निरंतर आपूर्ति का आनंद ले पाएंगे और मेम्ने के विवाह-भोज में भाग ले सकेंगे। यदि हम लौटे हुए प्रभु के कथन सुन कर भी उन्हें नहीं खोजते हैं, उन्हें स्वीकार नहीं करते हैं, बल्कि अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से बंधे रहते हैं, यह मानते हुए कि जब तक हम बाइबल पढ़ते हैं, प्रार्थना करते हैं और कड़ी मेहनत करते हैं प्रभु तब तक हम प्रभु यीशु का स्वागत करने में सक्षम होंगे, और हम अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य की तलाश या जांच नहीं करते हैं, तो हम मूर्ख कुंवारियों के जैसे हो जाएंगे, और हम हमेशा के लिए अंत के दिनों के परमेश्वर से उद्धार प्राप्त करने का मौका चूक गए होंगे!

परमेश्वर के प्रबोधन और मार्गदर्शन का धन्यवाद। हम सभी समझदार कुंवारियाँ बन सकें जो प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत कर भोज में उनके साथ बैठ कर भाग ले सकती हैं। आमीन!

Hindi Christian Music Video | पूरा सफ़र तेरे संग | Lord, You Are My Life

कश्ती सा मैं था, भटका समन्दर में।
चुन कर मुझे, तूने राह दी तेरे शरण की।
तेरे परिवार में स्नेह से मुझे शांति मिली।
तू दे आशीष और दे वचन न्याय के।
फिर भी हूँ असमर्थ तेरी दया संजोने में।
अक्सर किया है विद्रोह, दुखाया तेरा दिल।
अनदेखा कर मेरे पापों को मुझे मोक्ष की ओर बढ़ाता।
जाऊँ मै दूर तो ख़तरों से खींच लाता।
करूँ विद्रोह, तो तू छुपे, तम मुझे जकड़ ले।
मैं वापस आऊँ, तू करुणा दे मुझे, हँस के पकड़ ले।
जब शैतान मारे मुझे, तू भर दे ज़ख़्म दिल के मेरे।
हर परीक्षा में तू साथ हो मेरे।
जल्द सुबह आएगी, और फिर से चमकेगा नीला गगन,
जब तुम मेरे साथ हो।
जल्द सुबह आएगी, और फिर से चमकेगा नीला गगन,
जब तुम मेरे साथ हो।

तू मेरा जीवन, तू मेरा प्रभु।
साथी तू मेरा, हमेशा रहे साए सा।
इन्सां तू बनना सिखाता है, और देता है जीवन और सच।
तेरे ही साथ भव्यता से भरे मेरा जीवन।
चाहत न कोई रखूं, तेरे नियम से ही चलूँ।
बनूं सच्चा सृजन, लौटूं तेरी ओर।
तेरे वजूद में जी कर, तुझ से कहता हूँ, तेरी सुनता हूँ।
अकेला तुझको छोड़ूंगा न मैं अब।
तेरे साथ में, तूफां का डर नहीं।
जब ढँके रात मुझे, अकेला मै अब नहीं।
जो तू है मेरे पास, ख़तरा हो या मुश्किल, मैं लड़ूं।
तेरे साथ में, सफ़र होंगे आसान।
मुश्किल भरे रास्ते जो मिलते हैं सफ़र में,
ले जाते हैं ओर सुंदर बसन्त की।
जल्द सुबह आएगी, और फिर से चमकेगा नीला गगन,
जब तुम मेरे साथ हो।
तेरे साथ में, तूफां का डर नहीं।
जब ढँके रात मुझे, अकेला मै अब नहीं।
जो तू है मेरे पास, ख़तरा हो या मुश्किल, मैं लड़ूं।
तेरे साथ में, सफ़र होंगे आसान।
मुश्किल भरे रास्ते जो मिलते हैं सफ़र में,
ले जाते हैं ओर सुंदर बसन्त की।
जल्द सुबह आएगी, और फिर से चमकेगा नीला गगन।
मैं तेरे संग हूँ।

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सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ें, आप जीवन के कई रहस्यों के बारे में खोज पाएंगे।

Best Hindi Christian Worship Song | समय (Lyrics)

अकेली रूह चली आई है इतनी दूर से,
भविष्य को जाँचती, अतीत को खोजती,
कड़ी मेहनत करती, सपनों का पीछा करती।
इस बात से अनजान, कहाँ से आती-जाती है वो,
आँसुओं में पैदा होती, मायूसी में गुम होती।
कदमों तले कुचली जाती ख़ुद को संभालती फिर भी।
तुम्हारा आना कर देता है भटके व्यथित जीवन का अंत।
मुझको दिखती उम्मीद की किरण,
स्वागत करती हूँ सुबह की रोशनी का।
दूर कोहरे में पाती हूँ झलक तुम्हारे रूप की।
वो चमक है, वो चमक है तुम्हारे चेहरे की।भटक गई थी मैं कल अनजान देश में,
मगर आज पा ली है राह मैंने अपने घर की।
ज़ख़्मों से छलनी, इंसान से अलग,
जीवन सपना है, मैं विलाप करती हूँ।
तुम्हारा आना कर देता है भटके व्यथित जीवन का अंत।
अब खोई हुई नहीं हूँ, भटकी हुई नहीं हूँ मैं।
अब अपने घर में हूँ मैं। तुम्हारा सफ़ेद लिबास दिखता है मुझे।
वो चमक है, वो चमक है तुम्हारे चेहरे की।
कितने जनम लिये, जनम लिये कितने साल इंतज़ार किया,
सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अब आगमन हुआ।
अकेली रूह को मिल गई राह, अब दुखी नहीं है ये।
हज़ारों साल का ये सपना।

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आइए यीशु मसीह का दूसरा आगमन का स्वागत करें और 2,000 साल की प्रतीक्षा का अंत करें। अभी पढ़ें।

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