रिश्ते टूटने के बाद बात समझ आयी

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गर्मियों की शुरुआत में एक दिन सुबह, एक हलकी खुशबू हवा में बिखरी हुई थी और धूप हर कोने में फैल रही थी। फूलों के चित्रों वाली एक शिफॉन पोशाक पहने हुए चीनयी मेट्रो स्टेशन पर खुश महसूस कर रही थी, और अगली ट्रेन के आने की प्रतीक्षा कर रही थी। अपने सिर को घुमाते हुए, चीनयी ने अनायास एक वीडियो स्क्रीन पर एक लड़की को एक लड़के के साथ सम्बन्ध-विच्छेद करते हुए देखा क्योंकि उस लड़के ने उसके साथ बेवफ़ाई की थी, फिर लड़की अपने चेहरे पर आँसू लिए दूसरी ओर घूमकर चली गई। चीनयी ने स्क्रीन को टकटकी लगाये देखा। तभी, उसने अचानक सोचा कि वह पहले कैसी थी, जब उसने एक सुंदर प्रेम की लालसा की थी जहां वह और उसका प्रेमी एक साथ जीवन गुजारेंगे, लेकिन अंत में, उसे केवल ज़ख्म और घाव मिले थे … “रिश्ते टूटने के बाद बात समझ आयी”पढ़ना जारी रखें

Hindi Christian Music Video 2018 | the Return of the Lord Jesus | “दो हज़ार सालों की अभिलाषा”

कि परमेश्वर ने किया है देहधारण हिल उठता है धार्मिक संसार,
होती है परेशान धार्मिक व्यवस्था,
और उन सभी की आत्मा होती है उद्वेलित
जिनको है अभिलाषा परमेश्वर के प्रकटन की।
कौन नहीं होता मोहित इस पर?
कौन नहीं करता अभिलाषा परमेश्वर के दर्शन की?
परमेश्वर ने बिताए हैं वर्षों मनुष्यों के मध्य, “Hindi Christian Music Video 2018 | the Return of the Lord Jesus | “दो हज़ार सालों की अभिलाषा””पढ़ना जारी रखें

सत्य क्या है? बाइबल का ज्ञान और सिद्धांत क्या है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

आदि में वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था।” “और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्‍चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, …” (युहन्ना 1:1, 14)।

मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ” (युहन्ना 14:6)।

सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर: तेरा वचन सत्य है” (युहन्ना 17:17)।

“उसने उनसे कहा, ‘यशायाह ने तुम कपटियों के विषय में बहुत ठीक भविष्यद्वाणी की; जैसा लिखा है: “ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझ से दूर रहता है। ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की आज्ञाओं को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं।” क्योंकि तुम परमेश्‍वर की आज्ञा को टालकर मनुष्यों की रीतियों को मानते हो।’ उसने उनसे कहा, ‘तुम अपनी परम्पराओं को मानने के लिये परमेश्‍वर की आज्ञा कैसी अच्छी तरह टाल देते हो! … इस प्रकार तुम अपनी परम्पराओं से, जिन्हें तुम ने ठहराया है, परमेश्‍वर का वचन टाल देते हो; और ऐसे ऐसे बहुत से काम करते हो‘” (मरकुस 7:6-9,13)।

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परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर ही मार्ग, सत्य और जीवन है।

कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं।

यह सत्य सामान्य मानवता का जीवन स्वभाव है, अर्थात्, वह जो मनुष्य से तब अपेक्षित था कि जब परमेश्वर ने आरंभ में उसका सृजन किया था, यानि, सभी सामान्य मानवता (मानवीय भावना, अंतर्दृष्टि, बुद्धि और मनुष्य होने का बुनियादी ज्ञान) है।

अंतिम दिनों का मसीह जीवन लेकर आता, और सत्य का स्थायी एवं अनन्त मार्ग प्रदान करता है। इसी सत्य के मार्ग के द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एक मात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा। “सत्य क्या है? बाइबल का ज्ञान और सिद्धांत क्या है?”पढ़ना जारी रखें

अब जबकि हमारे पाप क्षमा कर दिए गये हैं क्या हम स्वर्गराज्य में प्रवेश कर सकते हैं

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5 अगस्त, 2018 रविवार। बादल छाये हैं।

आज सभा के बाद, एक भाई मुझे खोजते हुआ आया, उसके चेहरे से चिंता झलक रही थी। उसने कहा कि परमेश्वर को लोगों से अपेक्षा है कि वे पवित्र बनें, लेकिन वह अक्सर अनजाने में पाप कर बैठता है, और यदि वह इस तरह से हमेशा पाप में जियेगा, तो क्या प्रभु के आने पर वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकेगा? मैंने उससे कहा कि प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था और उन्होंने हमारे सारे पाप अपने ऊपर ले लिए और अपने जीवन से उन पापों की कीमत चुकाई थी। मैंने कहा कि प्रभु यीशु में हमारे विश्वास के कारण हमारे पापों को क्षमा कर दिया गया था, और प्रभु अब हमें पापी के रूप में नहीं देखते हैं, और जब तक हम सब कुछ त्याग सकते हैं और अपने आप को व्यय कर सकते हैं, प्रभु के लिए कड़ी मेहनत कर सकते हैं, और बिल्कुल अंत तक सह सकते हैं, तब तक हम प्रभु के लौटने पर स्वर्ग के राज्य में आरोहित किये जायेंगे। जब उस भाई ने मुझे यह कहते सुना, उसे देख ऐसा लगा, जैसे उसने जो उत्तर चाहा था, वह नहीं मिला, और वह थोड़ा निराश दिखते हुए चला गया। जब मैं उसे जाते हुए देख रहा था, तो मेरे मन में कुछ बहुत ही मिश्रित भाव आए। सच कहूँ तो, क्या मेरी भी चिंताएं वैसी ही नहीं थीं जैसी इस भाई की थीं? यह सोचते हुए कि कैसे मैं कई वर्षों तक प्रभु पर विश्वास करता था लेकिन अक्सर पाप से बंधा हुआ था, और एक ऐसी स्थिति में रह रहा था जहाँ मैं दिन में पाप करता और शाम को उन्हें स्वीकार करता था, मैं भी वैसे जीना नहीं चाहता था। लेकिन मैं वास्तव में पाप पर काबू पाने में सक्षम नहीं था, और इसलिए मैं अक्सर प्रभु से प्रार्थना करता और अपने धर्मग्रंथों के पठन को मजबूत करता था। और फिर भी मैंने कभी अपने पापों की समस्या का समाधान नहीं किया। प्रभु पवित्र है, तो क्या वह मेरे जैसे किसी व्यक्ति की प्रशंसा करेगा, जो इतना पापयुक्त है? “अब जबकि हमारे पाप क्षमा कर दिए गये हैं क्या हम स्वर्गराज्य में प्रवेश कर सकते हैं”पढ़ना जारी रखें

मसीह क्या है और उसका सार क्या है?

मैं इस बारे में आश्वस्त हूँ कि हम सभी “मसीह” शब्द से परिचित हैं। बाइबल में कहा गया है, “उसने उनसे कहा, परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो? शमौन पतरस ने उत्तर दिया, तू जीवते परमेश्‍वर का पुत्र मसीह है। यीशु ने उसको उत्तर दिया, हे शमौन, योना के पुत्र, तू धन्य है; क्योंकि मांस और लहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है” (मत्ती 16:15-17)। बहुत से लोग इन पदों को पढ़कर बिना सोचे समझे कहते हैं, “मसीह देहधारी प्रभु यीशु है” या “मसीह, परमेश्वर का पुत्र, मसीहा है”, वहीं कुछ अन्य लोग कहते हैं, “मसीह मनुष्य का पुत्र है” “मसीह का अर्थ है अभिषिक्त किया गया।” लेकिन इन दावों को सुनकर कुछ लोग उलझन में पड़ जाते हैं: पुराने नियम के नबी, राजा, और याजक सभी अभिषिक्त थे, तो क्या वे भी मसीह हैं? आखिर मसीह का अर्थ क्या है?

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इस सवाल का जवाब देने के लिए, आइये सबसे पहले परमेश्वर के वचनों के इन दो अंशों पर नज़र डालें, “देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है, तथा मसीह परमेश्वर के आत्मा के द्वारा धारण किया गया देह है। यह देह किसी भी मनुष्य की देह से भिन्न है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह मांस तथा खून से बना हुआ नहीं है बल्कि आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता तथा पूर्ण परमेश्वरत्व दोनों हैं। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य द्वारा धारण नहीं की जाती है। उसकी सामान्य मानवता देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियों को बनाए रखती है, जबकि दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य करती है।” “परमेश्वर देहधारी हुआ और मसीह कहलाया, और इसलिए वह मसीह, जो लोगों को सत्य दे सकता है, परमेश्वर कहलाता है। इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है… असल मसीह पृथ्वी पर केवल परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि वह देह भी है जिसे धारण करके परमेश्वर लोगों के बीच रहकर अपना कार्य पूर्ण करता है। यह वह देह नहीं है जो किसी भी मनुष्य के द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सके, बल्कि वह देह है, जो परमेश्वर के कार्य को पृथ्वी पर अच्छी तरह से करता है और परमेश्वर के स्वभाव को अभिव्यक्त करता है, और अच्छी प्रकार से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है, और मनुष्य को जीवन प्रदान करता है। “मसीह क्या है और उसका सार क्या है?”पढ़ना जारी रखें

वैवाहिक विश्वासघात की छाया से बाहर कैसे निकलें?

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आध्यात्मिक प्रश्नोत्तर के भाई-बहनों को नमस्कार,

मेरी शादी को बीस साल हो गए हैं। मुझे लगा कि मैं और मेरे पति एक दूसरे को समर्पित हैं। लेकिन अप्रत्याशित रूप से, मेरे पति ने विवाहेत्तर संबंध बना लिए। मैं बहुत परेशान हूँ और यह नहीं जानती कि इसका सामना कैसे करूं। मैं पूछना चाहती हूँ: वैवाहिक स्नेह इतना नाजुक क्यों होता है? मैं इस पीड़ा से कैसे बच सकती हूँ?

आपकी
मैरी

नमस्कार बहन मैरी,

आपके संदेश को देखकर, मैं समझ सकती हूँ कि आप इस वक्त कैसा महसूस कर रही हैं क्योंकि मेरे साथ भी वही हुआ है जो आपके साथ हुआ। उन अंधेरे दिनों में, यदि परमेश्वर के वचनों का मार्गदर्शन साथ नहीं होता, तो मुझे नहीं समझ आता कि आगे कैसे बढ़ना है। परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन ने मुझे यह समझने में मदद की कि वैवाहिक स्नेह इतना नाजुक क्यों होता है, और मुझे मानवीय पीड़ा की जड़ को जानने भी दिया। धीरे-धीरे, मैं अपने पति के विश्वासघात की छाया से निकल गई। “वैवाहिक विश्वासघात की छाया से बाहर कैसे निकलें?”पढ़ना जारी रखें

पवित्र आत्मा का कार्य क्या है? पवित्र आत्मा का कार्य कैसे प्रकट किया जाता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन

“जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो लोग सक्रिय रूप से प्रवेश कर सकते हैं; वे निष्क्रिय नहीं होते और उन्हें बाध्य भी नहीं किया जाता, बल्कि वे सक्रिय रहते हैं। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है तो लोग प्रसन्न और इच्छापूर्ण होते हैं, और वे आज्ञा मानने के लिए तैयार होते हैं, और स्वयं को दीन करने में प्रसन्न होते हैं, और यद्यपि भीतर से पीड़ित और दुर्बल होते हैं, फिर भी उनमें सहयोग करने का दृढ़ निश्चय होता है, वे ख़ुशी-ख़ुशी दुःख सह लेते हैं, वे आज्ञा मान सकते हैं, और वे मानवीय इच्छा से निष्कलंक रहते हैं, मनुष्य की विचारधारा से निष्कलंक रहते हैं, और निश्चित रूप से मानवीय अभिलाषाओं और अभिप्रेरणाओं से निष्कलंक रहते हैं। जब लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं, तो वे भीतर से विशेष रूप से पवित्र हो जाते हैं। जो पवित्र आत्मा के कार्य को अपने अंदर रखते हैं वे परमेश्वर के प्रेम को और अपने भाइयों और बहनों के प्रेम को अपने जीवनों से दर्शाते हैं, और ऐसी बातों में आनंदित होते हैं जो परमेश्वर को आनंदित करती हैं, और उन बातों से घृणा करते हैं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा स्पर्श किए जाते हैं, उनमें सामान्य मनुष्यत्व होता है, और वे मनुष्यत्व को रखते हैं और निरंतर सत्य का अनुसरण करते हैं। जब पवित्र आत्मा लोगों के भीतर कार्य करता है, तो उनकी परिस्थितियाँ और अधिक बेहतर हो जाती हैं और उनका मनुष्यत्व और अधिक सामान्य हो जाता है, और यद्यपि उनका कुछ सहयोग मूर्खतापूर्ण हो सकता है, परंतु फिर भी उनकी प्रेरणाएँ सही होती हैं, उनका प्रवेश सकारात्मक होता है, वे रूकावट बनने का प्रयास नहीं करते और उनमें कुछ भी दुर्भाव नहीं होता। … यदि अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में लोग सकारात्मक अवस्था में हों और उनके पास एक सामान्य आत्मिक जीवन हो, तो उनमें पवित्र आत्मा के कार्य पाए जाते हैं। ऐसी अवस्था में, जब वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं तो उनमें विश्वास आता है, जब वे प्रार्थना करते हैं, तो वे प्रेरित होते हैं, जब उनके साथ कुछ घटित होता है तो वे निष्क्रिय नहीं होते, और उनके साथ कुछ घटित होते समय वे उन सबकों या सीखों को देख सकते हैं जो परमेश्वर चाहता है कि वे सीखें, और वे निष्क्रिय, या कमजोर नहीं होते, और यद्यपि उनके जीवन में वास्तविक कठिनाइयाँ होती हैं, फिर भी वे परमेश्वर के सभी प्रबंधनों की आज्ञा मानने के लिए तैयार रहते हैं।”

“जब पवित्र आत्मा लोगों के प्रबोधन के लिए कार्य करता है, तो वह आम तौर पर उन्हें परमेश्वर के कार्य का ज्ञान देता है, और उनकी सच्ची प्रविष्टि और सच्ची अवस्था का ज्ञान देता है, और वह उन्हें संकल्प भी देता है, उन्हें परमेश्वर के उत्सुक इरादे और उसकी मनुष्य से वर्तमान अपेक्षाओं के बारे में समझने देता है, वह उन्हें हर तरह से खुलने का संकल्प देता है। यहाँ तक कि जब लोग रक्तपात और बलिदान से गुजरते हैं, उन्हें फिर भी परमेश्वर के लिए कार्य करना चाहिए, और जब वे उत्पीड़न और प्रतिकूल परिस्थितियों से मिलें, तब भी उन्हें परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, और उन्हें कोई अफ़सोस नहीं होना चाहिए, और परमेश्वर की गवाही देनी चाहिए। इस तरह का संकल्प पवित्र आत्मा की प्रेरणा है, और पवित्र आत्मा का कार्य है-लेकिन जान लो कि तुम हर गुजरते पल में इस तरह की प्रेरणा से संपन्न नहीं हो। कभी-कभी बैठकों में तुम बेहद प्रभावित और प्रेरित महसूस कर सकते हो और तुम अत्यधिक प्रशंसा करते हो और तुम नृत्य करते हो। तुम्हें लगता है कि दूसरे जिस पर सहभागिता कर रहे हैं, उसके बारे में तुम्हें एक अविश्वसनीय समझ है, तुम्हें अन्दर से बिलकुल नयेपन का एहसास होता है, और तुम्हारा हृदय खालीपन की किसी भी भावना के बिना बिल्कुल स्पष्ट होता है-यह सब पवित्र आत्मा के कार्य से संबंधित है। यदि तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो नेतृत्व करता है, और तुम जब कलीसिया में काम करने के लिए जाते हो तो पवित्र आत्मा तुम्हें असाधारण प्रबोधन और प्रकाशन देता है, जिससे तुम अपने काम में अविश्वसनीय रूप से नेक, जिम्मेदार और गंभीर बन जाते हो, तो यह पवित्र आत्मा के कार्य से संबंधित है।” “पवित्र आत्मा का कार्य क्या है? पवित्र आत्मा का कार्य कैसे प्रकट किया जाता है?”पढ़ना जारी रखें

Hindi Christian Music Video | Live in the Light | “प्रभुजनों की प्रार्थना”

ईश्वर के बंदे उठते उसके सिंहासन के समक्ष, दिल में प्रार्थनाएं उनके।
ईश्वर दे आशीष उन्हें जो लौटे प्रभु की ओर; वे सब रोशनी में हैं जीते।
विनती है पवित्र आत्मा से करे प्रबुद्ध हमें परमेश्वर की इच्छा से,
द्वारा वचन के।
सभी लोग संजोये परमेश्वर के वचन को और वे आएँ उसे जानने।
ईश्वर दे हमें और ज्यादा उसके अनुग्रह, जिससे जीवन का स्वभाव बदले।
ईश्वर करे परिपूर्ण हमें जिससे बनें एक मन और दिल उसके साथ।
हमें अनुशासित करे जिससे हम पालन अपने कर्तव्यों का करें।
राह दिखाए रोज़ पवित्र आत्मा जिससे हों हम
परमेश्वर के साक्षी और करें प्रचार।

सब लोगों को हो ज्ञान अच्छे और बुरे का, करें पालन सत्य का।
परमेश्वर दुर्जनों को दण्डित करे और कलीसिया में शांति रहे।
अर्पण सभी करें सच्चा प्रेम परमेश्वर को जो हैं सबसे सुहावने और प्यारे।
सब अड़चन हटाए परमेश्वर जिससे सौंपे खुद को पूरा हम।
प्रभु दे ऐसा दिल जो करे उससे ही प्यार, दिल जो जाए न उससे दूर।
सभी लौट आएं परमेश्वर के समक्ष जिन्हें उसने चुना है।
सभी मिलकर गाएँ गुणगान परमेश्वर के जिसने की महिमा की प्राप्ति।
परमेश्वर रहे साथ प्रजा के अपने, हमें अपने प्रेम में जीवित रखे।
परमेश्वर रहे साथ प्रजा के अपने, हमें अपने प्रेम में जीवित रखे।
“मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना” से

यीशु मसीह का “पूरा हुआ” कहने का वास्तविक अर्थ क्या है?

वह रविवार की सुबह भी किसी अन्य सुबह जैसी ही थी। मैंने बाइबल खोली और अपने आध्यात्मिक भक्ति की शुरुआत करते हुए मैंने इब्रानियों में 9:28 पढ़ा, जिसमें लिखा था: “वैसे ही मसीह भी बहुतों के पापों को उठा लेने के लिये एक बार बलिदान हुआ; और जो लोग उसकी बाट जोहते हैं उनके उद्धार के लिये दूसरी बार बिना पाप उठाए हुए दिखाई देगा” इसके बारे में ध्यान से सोच-विचार करते हुए, मैं उलझन में पड़ गयी। मैंने सोचा, “ऐसा नहीं हो सकता। क्या क्रूस पर यीशु मसीह के ‘पूरा हुआ‘ कहने का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो गया है? जब प्रभु लौटेंगे, हम तुरंत स्वर्ग में प्रवेश कर प्रभु के साथ भोज करेंगे, तो यहाँ यह कैसे लिखा है कि जब यीशु मसीह वापस आयेंगे तो वे मनुष्य को बचाने के लिए फिर से प्रकट होंगे? आखिर इन सबका मतलब क्या है?”

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जितना अधिक मैंने इसके बारे में सोचती जाती, उतना ही मेरा दिल संदेह से भरता जाता… मैंने सोचा, “ऐसे काम नहीं चलेगा! इस बारे में संगति करने के लिए मुझी किसी को तो खोजना ही होगा।” तभी मुझे कलीसिया के अपनी सहकर्मी, बहन शाओ ज़ू की याद आई। हम आमतौर पर एक साथ बाइबिल पर चर्चा किया करते थे, और सौभाग्य से बहन शाओ ज़ू, किसी जगह एक सभा में भाग लेकर अभी-अभी वापस ही आई थी। ऐसा कुछ नहीं था जिसे तलाशने में बहन शाओ मेरी मदद न कर सके। “यीशु मसीह का “पूरा हुआ” कहने का वास्तविक अर्थ क्या है?”पढ़ना जारी रखें

अपने विवाह-संकट के प्रति एक ईसाई की प्रतिक्रिया कैसी होनी चाहिए?

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एक अदभुत, मंगलमय विवाह
जबसे मुझे याद है, मैंने हमेशा अपने माता-पिता को बहस करते हुए और अक्सर अपनी माँ को रोते हुए देखा है। उस वक्त, मैं एक शांतिपूर्ण, सुखी परिवार के लिए तरसती थी। जब मैं बड़ी हुई, तो मैंने एक ऐसे पति की तलाश करने की ठानी, जो मेरे बारे में सोचे और जो अपने परिवार की देखभाल कर सके। मैं एक शानदार, सुखद विवाह की उम्मीद करती थी।

एक रिश्तेदार ने मेरे पति का मुझसे परिचय कराया, जिसके बाद हमने शादी कर ली और हमारी दो बेटियाँ हुईं। उस समय, हमें रेत का खदान चलाने के लिए अनुबंधित किया गया था, और मेरे पति हर दिन बहुत मेहनत करते थे। लेकिन फिर भी जैसे ही वे घर आते, वे कपड़े धोने और रात का खाना बनाने जैसी चीजें किया करते थे। मेरे पति मुझे बहुत प्यार करते थे, वे मुझे कभी चिंता नहीं करने देते थे, न ही किसी भी छोटे-बड़े मामले में मुझसे मदद मांगते थे। मेरे सभी पड़ोसी मुझसे ईर्ष्या करते थे क्योंकि मेरे पास इतना अच्छा पति और इतना खुशहाल परिवार था। मैं बहुत संतुष्ट थी; मुझे लगा कि मैंने एक अच्छे इंसान से शादी की है और मेरे शेष जीवन में मुझे सहारा देने के लिए कोई इन्सान मेरे साथ है। बाद में, मेरे पति और एक रिश्तेदार एक व्यवसाय शुरू करने के लिए बाहर चले गए, और मैं घर पर रहकर रेत खदान व्यवसाय को सम्भालने लगी। हालाँकि यह बहुत कठिन और थका देने वाला काम था, लेकिन मुझे यह योग्य लगा, न केवल इसलिए क्योंकि न सिर्फ यह मेरे पति पर से दबाव कम करता था, बल्कि इसलिए भी कि इससे हमारा जीवन और बेहतर बनने लगेगा। इस तरह, एक ही लक्ष्य के लिए हम दोनों के प्रयासों के कारण, एक साल बाद हमने शहर में एक घर खरीद लिया। फिर मुझे शहर में नौकरी मिल गई, और हमने अपने रेत के खदान को सम्भालने के लिए मेरे ससुर को सौंप दिया। “अपने विवाह-संकट के प्रति एक ईसाई की प्रतिक्रिया कैसी होनी चाहिए?”पढ़ना जारी रखें

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